16 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
का प्रश्न है, बजट में यही बात स्पष्ट दिखाई देती है, क्योंकि वास्तविक परिसंपत्ति के आधार पर खर्च की जो नई मदें उन्होंने दिखाई हैं, वह आठ लाख रुपए की तुच्छ राशि के सिवाए कुछ नहीं है, जो प्रांत की मौजूदा तम्बाकू कराधान प्रणाली में संशोधन के द्वारा प्रस्तावित है। 37 लाख रुपए के अतिरिक्त खर्च के लिए आठ लाख रुपए के राजस्व पर ही भरोसा किया जा सकता है। इसलिए मेरा यह कहना सही है कि बजट के रूप में 37 लाख रुपए का जो तमाशा हमारे सामने प्रस्तुत किया गया है, वह फिर अगले वर्ष नहीं हो सकेगा। महोदय! अब हम दूसरे दृष्टिकोण से बजट को देखें। मैं जानना चाहता हूं कि किन जिम्मेदारियों का निर्वाह कांग्रेस सरकार करना चाहती है। हमें पता होना चाहिए कि हमारी कुल देनदारी क्या है। महोदय! यह तो छोटी सी बात है कि हम देनदारी कल पूरी कर सकते हैं, परसों कर सकते हैं, या इसमें लंबा समय लग सकता है। यह तो बिल्कुल अलग प्रश्न है। बुनियादी और अति महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि पक्ष और विपक्ष में बैठे हम लोगों को, जहां तक इस प्रेसिडेंसी की जनता के कल्याण का संबंध है, सर्वसम्मति से यह ज्ञात होना चाहिए कि प्रेसिडेंसी के लोगों के कल्याण के लिए हम क्या काम करना चाहते हैं। इसलिए इस प्रश्न के अलावा, स्थिति से हम कैसे और कितनी जल्दी निबट सकेंगे, हमारे लिए यह बहुत जरूरी है कि हम इस बात का जायज़ा लें कि अंततः स्थिति क्या होने वाली है। महोदय! अब यह स्पष्ट है कि आज तक इस प्रेसिडेंसी में जो परंपरागत बातें सरकार कर रही है, हालांकि उन्होंने अपना दायित्व और कर्तव्य जो शिक्षा, जन-स्वास्थ्य, चिकित्सा और कुछ हद तक जलापूर्ति तक फैला है, पूरा नहीं किया है। ये सर्वसम्मति से स्वीकृत सरकार के कार्य हैं। मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि कांग्रेस सरकार जब 17 अगस्त 1937 को सत्ता में आई, तब उसने एक बयान जारी किया था, जो ‘सरकार की श्रम नीति’ के नाम से जाना जाता है। मैं अपने माननीय मित्र को इस बयान की याद दिलाना चाहता हूं, क्योंकि उन्होंने इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया है कि सरकार ने प्रेस विज्ञप्ति में क्या कहा था। इस विज्ञप्ति के हवाले से मैं कहना चाहूंगा कि सरकार ने स्पष्ट रूप से यह तथ्य स्वीकार किया था कि केवल ये ही कर्तव्य नहीं हैं, जिन्हें यह सरकार अनिवार्य रूप से करेगी। कांग्रेस सरकार ने स्वीकार किया है कि जिन्हें आवश्यक सेवाएं कहते हैं, जैसे शिक्षा, जन-स्वास्थ्य, चिकित्सा सहायता और जल-आपूर्ति के अतिरिक्त अन्य दूसरे काम भी हैं, जिन्हें करना सरकार का कर्तव्य है और जो इस समय सभी आधुनिक देशों में आमतौर पर उपलब्ध हैं। मैं समझता हूं ये कर्त्तव्य हैं — बेरोजगारी भत्ता, रोगी बीमा, वृद्धावस्था पेंशन, प्रसूति लाभ और असमय मृत्यु पर उसके आश्रितों को सहायता। इसलिए हमें इस स्थिति से आरंभ करना है कि हमारी सरकार, जिसका दावा है कि उसके हाथ में कार्यभार की बागडोर है, उसे इन कर्तव्यों का पालन करना होगा। इसलिए प्रश्न यह है कि यदि सरकार अपने इन दायित्वों को निभाने का फैसला करती है, तो उसका कुल
खर्च कितना होगा? जैसा कि मैंने कहा कि इस बात का कोई महत्त्व नहीं है और इससे समस्या हल भी नहीं होती है कि हम इस काम को आज करने की स्थिति में हैं अथवा