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बजट पर चर्चा

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नहीं। आवश्यकता इस बात की है कि हमें पता होना चाहिए कि हमारे क्या कर्तव्य हैं और हमें कितना खर्च झेलना पड़ेगा। महोदय! इन सभी बातों पर विचार करने पर मैं चाहूंगा और बहस की समाप्ति पर भी मैं इसका स्वागत करूंगा, यदि मेरे माननीय मित्र मंत्री महोदय यह बताएं कि यदि हम इन दायित्वों को पूरी तरह वहन करेंगे, तो प्रेसिडेंसी के राजस्व पर कितना भार पड़ेगा। मैंने अपनी क्षमता के अनुसार इस बारे में हिसाब लगाया है। मेरा हिसाब-किताब एकदम सही नहीं हो सकता। मेरे पास कोई जानकारी नहीं है और न ही कोई आंकड़े हैं। मुझे विशेषज्ञों की कोई सहायता भी उपलब्ध नहीं है। परंतु मैंने एक तरह का अनुमान लगाया है कि सरकार का कुल वित्तीय दायित्व कितना हो सकता है। मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि इस प्रेसिडेंसी का दायित्व 24 करोड़ रुपए बैठेगा। यह बात सरकार को ध्यान में रखनी होगी। मुझे इससे कोई एतराज नहीं है कि कौन सी सरकार आती है। हो सकता है, यही सरकार इस प्रेसिडेंसी के प्रशासन को निरंतर चलाती रहे। मुझे कोई आपत्ति नहीं है, यदि सरकार को अपनी जिम्मेदारियों का बोध है। इसलिए हमारे सामने प्रश्न यह है कि 24 करोड़ रुपए की इस राशि को हम कैसे प्राप्त करेंगे? इसमें थोड़ा-बहुत हेरफेर हो सकता है। इस सरकार का खर्च इसके नजदीक ही पहुंचेगा। महोदय, मैं पूछना चाहता हूं कि क्या यह सरकार या कोई अन्य सरकार इतना धन जुटाने में सक्षम है? दुनिया के दूसरे देशों के कुछ राजस्व आंकड़े लें और इस प्रेसिडेंसी की परिस्थितियों से उनकी तुलना करें। मैंने कुछ देशों से प्रति व्यक्ति राजस्व के जो आंकड़े एकत्र किए हैं, वे इस प्रकार हैंः

पौंड शिलिंग पेंस

कनाडा 9 8 0

दक्षिण ऑस्ट्रेलिया 19 0 0

न्यू साउथ वेल्स 13 0 0

न्यूजीलैंड 22 0 0

दक्षिण अफ्रीका संघ 4 0 0 (इसमें प्रांतीय सरकारों

द्वारा एकत्र राजस्व

सम्मिलित नहीं हैं)

पौंड शिलिंग पेंस

ऑस्ट्रेलिया 12 0 0

आयरिश फ्री स्टेट 10 0 0

बंबई 0 0 7

महोदय! यह चौंका देने वाली स्थिति है। यह तस्वीर का एक पहलू है, जो ठीक विपरीत है। वह स्थिति किसी भी वित्त मंत्री को जो इस प्रेसिडेंसी में लोगों के कल्याण के लिए काम करना चाहता है, विचलित कर देगा।