314 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
में है। यह चरागाह पशुओं को चराने के लिए ग्रामीणों को बेचा जाता है तथा इसे किसी और उद्देश्य हेतु नहीं दिया जा सकता है क्योंकि गांव में उपलब्ध शेष चरागाह क्षेत्र उनकी आवश्यकतानुसार पर्याप्त नहीं है।
(3) कुरन (चरागाह) के लिए निर्धारित राजुर-बाबुला की सर्वेक्षण संख्या 71 को भी इन्हीं कारणवश महारों को नहीं दिया जा सका।
मैं यह भी कहना चाहूंगा कि पिंपलाद और राजुर-बाबुला की 11 सर्वेक्षण संख्या जो लगभग 200 एकड़ थी, कृषि के लिए दी जाने वाली कुल उपलब्ध भूमि थी। इसलिए उन्हें निर्धारित मूल्य से 12 गुणा कम मूल्य पर बिक्री के लिए रखा गया तथा यह आदेश दिया गया कि महार, भील और कोली के अलावा कोई और इसके लिए बोली न लगाए। धनी लोगों के द्वारा की जाने वाली मंहगी प्रतियोगिता से बचने के लिए यह विशेष शर्त लगाई गई थी। हाल ही में संस्वीकृत कागजात देखने से पता चलता है कि पिंपलाद के दो कोली और तीन महारों तथा राजुर-बाबुला के एक कोली और तीन महार इसके खरीददार हैं।
(बोंबे लेजिस्लेटिव काउंसिल डिबेट्स, खंड 21, पृ. 219, 1 अक्तूबर 1927)
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ठाणे जिला : चरागाह
डॉ. भीमराव अम्बेडकर की ओर से डॉ. पी. जी. सोलंकी :
क्या सरकार यह बताने की कृपा करेगी कि —
(क) क्या वर्ष 1926 के विविध ज्ञान विस्तार के पृष्ठ 372 और 417 पर प्रकाशित
सूचना की ओर उनका ध्यान आकर्षित किया गया है?
(ख) यदि हां, तो ऐसी वरकाश या घास वाली भूमि को कर मुक्त करने का आदेश
देने के लिए, वे क्या कार्रवाई करने का विचार कर रहे हैं?
(ग) क्या वे ठाणे जिले में बदलापुर गांवों की वन भूमि को कृषि एवं चरागाह के
उद्देश्य से आरक्षित रखने का विचार कर रहे हैं, क्योंकि इनसे आय अपेक्षाकृत
बहुत ही कम है?
माननीय श्री जे.एल. रियू : (क) केवल तभी जब माननीय सदस्य इस प्रश्न की सूचना देंगे।
(ख) नहीं।
(ग) नहीं।
(बोंबे लेजिस्लेटिव काउंसिल डिबेट्स, खंड 21, पृ. 269-70, 1 अक्तूबर 1927)
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दलित वर्ग के लिए वनभूमि
डॉ. भीमराव अम्बेडकर की तरफ से डॉ. पी.जी. सोलंकी : क्या सरकार यह बताने की कृपा करेगी कि —