18 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
अब प्रेसिडेंसी की वित्तीय स्थिति के संदर्भ में जो बात हमें ध्यान में रखनी होगी, वह यह है कि हमारा राजस्व जहां का तहां है। मैं स्वयं वित्त मंत्री के उदाहरण प्रस्तुत करता हूं। अपने पिछले वर्ष के बजट भाषण में उन्होंने 1922 से 1935 के बीच विभिन्न प्रांतों के बहुत उपयोगी राजस्व वृद्धि के तुलनात्मक आंकड़े दिए थे। वृद्धि इस प्रकार हैः
प्रतिशत
मद्रास 26.7
पंजाब 28.6
संयुक्त प्रांत 16.7
आसाम 14.7
बंगाल 11.9
बंबई 3.00
बंबई के 3 प्रतिशत में और भी ह्रास होगा। यह वृद्धि इस कारण हुई है कि उसमें उन सभी अतिरिक्त करों को जोड़ लिया गया है, जो 1922 से लगाए गए हैं। यदि आप 1922-35 के बीच इस प्रेसिडेंसी में लगाए गए अतिरिक्त करों को घटा दें, तो हमारे राजस्व में साढे़ पांच प्रतिशत का ह्रृस हो जाएगा। इसलिए हमारी स्थिति यह है कि हमारे राजस्व में कतई वृद्धि नहीं हो रही है। उसमें रुकावट हो गई है। इसमें दो बातें और जोड़ दें। पहली बात यह है कि इस सरकार द्वारा लागू मद्यनिषेध नीति से हालात और बिगड़ेंगे। दूसरी बात यह है कि इस सरकार ने यह नीति घोषित की है कि लगान कम कर दिया जाएगा। यह वास्तविकता है कि इन दोनों मदों का योग 7 करोड़ रुपए बैठता है। सरकार की नीति के संदर्भ में मान लेना चाहिए कि यह सात करोड़ रुपए प्रेसिडेंसी के राजस्व से लुप्त हो रहे हैं। इसलिए कुल राजस्व जिसको आप स्थायी आय कह सकते हैं, वह 5 करोड़ रुपए रह जाएगी। इसके विपरीत जैसा कि मैंने कहा है, आपको 24 करोड़ रुपए के दायित्वों का वहन करना होगा।
महोदय! अब प्रश्न यह है कि इस प्रेसिडेंसी के वित्तीय साधनों में सुधार के उपाय क्या हैं? मुझे यह कहते हुए अत्यंत दुःख होता है, परंतु वास्तव में मैं कहूंगा कि वित्तीय वक्तव्य और मेरे माननीय मित्र का बजट भाषण दर्शाता है कि यह बजट प्रतिगामी है। यह एक ऐसा बजट है, जिससे पता चलता है कि सरकार अपने वचन से मुकर रही है। महोदय! हमारे वित्त मंत्री के पिछले बजट भाषण में जहां प्रशंसा उचित है, वहां प्रशंसा करनी चाहिए। इसमें एक साहस का पुट था, क्रांति के तत्त्व थे, जिससे हमारे पक्ष में बैठे हुए सदस्यों को प्रसन्नता हुई थी। पिछली बार के उनके भाषण से मैंने इस बार के भाषण की तुलना की है और दुःख की बात है कि मुझे दोनों में विरोधाभास दिखाई दिया है। महोदय! पिछले वर्ष मेरे माननीय मित्र ने जो भाषण दिया था, उसके मूल्यांकन से मुझे यह आभास हुआ था कि वह एक बड़ी कठिन