III. विश्वविद्यालय सुधार समिति - Page 345

328 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

दूसरी समस्या पर विचार करूंगा। 1857 के समावेशन अधिनियम में विश्वविद्यालय को शिक्षण कार्यों का उत्तरदायित्व लेने की अनुमति हेतु कोई प्रावधान नहीं रखा गया था। 1904 के अधिनियम में पहली बार ‘विद्यार्थियों के अनुदेश हेतु प्रावधान बनाने’ के उद्देश्य (अन्यों के मध्य) से समावेश किए गए विश्वविद्यालय के रूप में व्याख्या किया गया, यह एक ऐसा वाक्य है, जिससे यह ध्वनित होता है कि उच्च माध्यमिक स्तर पर विद्यार्थियों से कार्य कराया जाए। सभी पुराने विश्वविद्यालय, विश्वविद्यालय आयोग के इस परामर्श को स्वीकार करते हैं कि विश्वविद्यालय एक अध्यापन संस्था के रूप में अपना अस्तित्व बनाए और उच्चतर शिक्षा का प्रावधान न करे। इसके परिणामस्वरूप आज हम पाते हैं कि स्नातक-पूर्व शिक्षण स्नातकोत्तर शिक्षण से अलग कर दिया गया है। इसमें से पहले शिक्षण का उत्तरदायित्व विश्वविद्यालय और दूसरे शिक्षण का उत्तरदायित्व महाविद्यालयों द्वारा लिया गया है।

स्नातकोत्तर और स्नातक-पूर्व परीक्षण के बीच ऐसे किसी भी विभाजन हेतु मैंने पूरी तरह विरोध किया है। मेरे कारण इस प्रकार हैं —

(1) स्नातकोत्तर कार्य और स्नातक-पूर्व कार्य में अलगाव का अर्थ होता है, अनुसंधान से शिक्षण का अलगाव। किंतु यह स्वाभाविक है कि जहां अनुसंधान शिक्षण से अलग कर दिया जाता है, वहां अनुसंधान को हानि होती है। इस विषय में लंदन में विश्वविद्यालय शिक्षा पर 1911 के आयुक्तों द्वारा भली-भांति विचार किया गया है :

  1. शिक्षण निस्संदेह प्रारंभिक कार्य में प्रमुख रहेगा और अनुसंधान उच्चस्तरीय

कार्य के संदर्भ में प्रमुख रहेगा। किंतु यह विश्वविद्यालय के सर्वोपरि हित की

बात होगी कि वहां के विशिष्ट आचार्य स्नातक-पूर्व के ही शिक्षण में भाग लेना

प्रारंभ कर दें। अपने विश्वविद्यालयी जीवन के प्रारंभ से ही कनिष्ठ विद्यार्थियों के

संपर्क में आने से ही शिक्षक अपने विषय के संकल्पन को उन्हें समझा सकता

है और अपनी विधियों के अनुसार उन्हें प्रशिक्षित कर सकता है। इससे उसे दो

लाभ होंगे, एक तो वह अनुसंधान के लिए सर्वोत्तम विद्यार्थियों का चयन कर

सकेगा और दूसरे उनसे सर्वोत्तम कार्य ले सकेगा। इसके अतिरिक्त यह शिक्षक

का व्यक्तिगत प्रभाव होगा कि कोई व्यक्ति अपने विषयों में मौलिक कार्य करे तो

वह उसे प्रेरणा दे, उसे उत्साहित करे और उसमें शिष्यत्व की भावना जगाए।

उसका व्यक्तिगत ऐसी चयनात्मक शक्ति होती है, जिससे जो उस विशेष कार्य

के लिए योग्य हैं, वे स्वैच्छिक रूप में नाम लिखा देते हैं और उनका व्यक्तिगत

प्रभाव उस मनोवृत्ति से पुनर्प्रस्तुत और विस्तृत होता है, जो अपने स्टाफ को

प्रेरित करती है। यह कुछ ऐसे विद्यार्थियों की ही बात नहीं जो अकेले लाभ

उठाते हों, सभी ईमानदार विद्यार्थी अपने उन शिक्षकों के सहयोग से अपार लाभ

प्राप्त करते हैं, जो उन्हें स्वतंत्र और मौलिक सोच के कार्य का कुछ मार्ग दिखाते

हैं। हैल्महोल्तज़ कहते हैं ‘कोई भी व्यक्ति जो एक बार प्रथम श्रेणी के एक या