III. विश्वविद्यालय सुधार समिति - Page 346

विश्वविद्यालय सुधार समिति

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अनेक व्यक्तियों के संपर्क में आया हो, तो जीवनपर्यंत उसका संपूर्ण मानसिक स्तर बदला रहता है।’ भाषणों का उपयोग अभी समाप्त नहीं हुआ है और पुस्तकें कभी भी पूरी तरह से जीवंत मौखिक शब्द का स्थान नहीं ले सकतीं। वे उस प्रयोगशाला और संगोष्ठी में अधिक आभ्यंतर शिक्षण का थोड़ा स्थान ले सकती हैं, जो विश्वविद्यालय शिक्षा के सामान्य पाठ्यक्रम की सीमा से बाहर नहीं हो और जिसमें एक विद्यार्थी न केवल अपने कार्य की पुष्टि में पुस्तकों से प्राप्त निष्कर्षों और कारणों का ज्ञान प्राप्त करता है अपितु विकासशील चिंतन की वास्तविक प्रक्रिया तथा अत्यंत प्रशिक्षित और मौलिक मस्तिष्क की कार्यप्रणाली भी सीखता है।

  1. यदि यह माना जाए कि विश्वविद्यालय के उच्चस्तरीय शिक्षक स्नातक-पूर्व कार्य में भी हिस्सा लें और वहां उनकी चेतना उन्हें प्रभावित करे, तो उन्हीं आधारों पर यह स्वीकार करना होगा कि उन्हें स्नातकोत्तर कार्य के स्तर पर पहुंचने पर अपने विद्यार्थियों की अच्छाई से वंचित नहीं रखना चाहिए। इस कार्य को विश्वविद्यालय के शेष कार्यों से अलग नहीं किया जाना चाहिए और भिन्न संस्थाओं में विविध शिक्षकों द्वारा इसे संचालित किया जाना चाहिए। जहां तक शिक्षक का संबंध है, यह आवश्यक है कि उसके अधीन स्नातकोत्तर विद्यार्थी होने चाहिएं। वह स्वयं भी मौलिक कार्य करता है और प्रायः उच्चस्तरीय विद्यार्थियों के सहयोग से शोध संबंधी सामग्री प्राप्त करता है। उनकी सभी कठिनाइयां परामर्शों से युक्त होती हैं और उनका विश्वास और उत्साह ताजगी (ऊर्जा) और शक्ति का मुख्य स्रोत (साधन) होता है। वह उस कल्पना लोक और प्रमाद से भी बचा रहता है, जो एकाकी कार्यकर्त्ता पर भी अधिकार जमा लेते हैं। विश्वविद्यालय के आचार्यों का कोई प्रश्न नहीं हो सकता, अन्यथा विश्वविद्यालय की संपूर्ण स्थिति का यहां शिक्षकों की उच्चतर कक्षा के बजाए ह्रास होगा। दूसरी ओर, उच्च श्रेणी का एक विश्वविद्यालय शिक्षक स्वाभाविक रूप से अपने उन स्नातकोत्तर विद्यार्थियों को रखना चाहेगा, जिन्हें उसने पहले से अपने ही ढंग से तैयार किया है, हालांकि उसकी प्रयोगशाला या संगोष्ठी दूसरे विश्वविद्यालय से आए विद्यार्थियों के लिए है। इनमें से कुछ ऐसे भी हो सकते हैं, जो किसी विश्वविद्यालय से न आए हों और कुछ लंदन विश्वविद्यालय के अन्य शिक्षकों के विद्यार्थी हो सकते हैं। व्यापक स्तर पर परस्पर विचार-विनिमय की भावना विकसित होनी चाहिए और विद्यार्थी को एक ही विषय पर एकाधिक शिक्षकों के अधीन अध्ययन करते हुए लाभार्जन करना चाहिए। परंतु यह उच्चतर कार्य से निम्नस्तर को अलग करने से संबंधित पूरी तरह से भिन्न बात है। विश्वविद्यालय के उपाचार्य पदों के लिए उत्तम लोगों का मिलना हमारे विचार में संभव नहीं है। यदि आचार्यों को उच्चतम कार्य करने के लिए किसी भी रूप में रोका जाए या उत्तम विद्यार्थियों को आकर्षित करने