330 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
के लिए उन्हें अपनी ख्याति को फैलाने में बाधा पहुंचाई जाए।
- विश्वविद्यालय के स्नातक-पूर्व विद्यार्थियों के लिए यह बड़ी बुरी स्थिति है
कि स्नातकोत्तर विद्यार्थी दूसरी संस्थाओं में भेज दिए जाएं। इन विद्यार्थियों को
हमेशा उनके संपर्क में होना चाहिए, जो इनके मुकाबले अधिक अग्रवर्ती कार्य
कर रहे हैं तथा जो इनसे बहुत अधिक पीछे भी नहीं हैं और जो आदर्श प्राप्त
करने के लिए प्रेरणा और साहस दे रहे हैं।
कम से कम मेरी दृष्टि में उच्च अनुसंधान कार्य के लिए विनाशक परिणाम उसे शिक्षण कार्य से अलग करने में दिखाई देता है। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि बहुत से भारतीय विद्यार्थी, जो लंदन विश्वविद्यालय और अन्य विश्वविद्यालयों से स्नातकोत्तर उपाधियां लेकर वापस आते हैं, इस रूप में असफल होते हैं कि उन्हें विषय का पूरा ज्ञान नहीं हो पाता। यद्यपि उन्हें शैक्षिक कार्य-क्षेत्र में सर्वोच्च पद प्राप्त हो जाते हैं। इसका कारण यह हो सकता है कि उनका स्नातक-पूर्व प्रशिक्षण उच्च अनुसंधान कार्य के लिए पूरी तरह से अपर्याप्त था। समिति को याद होगा कि स्नातकोत्तर प्रशिक्षण अपने आर्विभाव और संकल्पन में बहुत आधुनिक है। कैंब्रिज और आक्सफोर्ड विश्वविद्यालयों में ऐसे अनेक व्यक्ति थे, जिन्होंने बहुत परिश्रम से श्रेष्ठकार्य किया, हालांकि इन विश्वविद्यालयों में स्नातकोत्तर विभाग नहीं थे। यहां तक कि आज भी आक्सफोर्ड, कैंब्रिज और लंदन विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर विभागों के अध्यक्ष वे व्यक्ति हैं, जो केवल स्नातक हैं और इतने पर भी वे भली-भांति स्नातकोत्तर विद्यार्थियों को अनुसंधान कार्य में निर्देशन दे रहे हैं और विश्व के सभी क्षेत्रों के विद्यार्थियों के लिए आकर्षण का केन्द्र बने हुए हैं इसका कारण यही है कि उनका स्नातक-पूर्व प्रशिक्षण बहुत ऊंचे स्तर का था। इसलिए, मैं इस बात पर बल देना चाहता हूं कि विश्वविद्यालय यदि स्नातकोत्तर कार्य की ठोस विधि की संरचना के निर्माण का इरादा रखता है, तो उसे स्नातक-पूर्व छात्रों के शिक्षण को भी अपने कार्य-क्षेत्र में लेना चाहिए।
(2) दूसरी बात यह है कि विश्वविद्यालय द्वारा अपने स्टाफ के माध्यम से स्नातकोत्तर स्तर पर प्रशिक्षण हेतु प्रत्यक्ष उत्तरदायित्व लेने पर यह संभावना हो सकती है कि इससे विश्वविद्यालय शिक्षकों के कारण महाविद्यालयों के उन शिक्षकों की क्षमता पर उल्टा प्रभाव पड़े, जो यह समझते हैं कि उनके स्तर को महाविद्यालय की औपचारिक एवं स्थायी सीमाओं द्वारा अकारण ही घटाकर एक निम्नस्तरीय कार्य में बदल दिया है।
(3) तीसरी बात यह है कि स्नातकोत्तर कार्य के लिए विश्वविद्यालयां के आचार्यों की नियुक्तियां और उनका कार्य विश्वविद्यालय के संसाधनों का मात्र दुरुपयोग है और इसे महाविद्यालयों के संसाधनों के समुचित उपयोग से सहज ही दूर किया जा सकता है। हमारी विश्वविद्यालयीन शिक्षा विधि में महाविद्यालय ही एकमात्र शिक्षा प्राप्ति के स्थान हैं। किंतु इस समय वे अलग-अलग निकायों की परिसंपत्ति हैं और उनका