विश्वविद्यालय सुधार समिति
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प्रबंध अलग-अलग शासी निकायों द्वारा होता है। किसी महाविद्यालय द्वारा प्राप्त आय उसकी अपनी ही निधि में जाती है। यदि आवश्यक खर्चों के उपरांत अधिशेष राशि बचती है, तो वह उनकी निधि को ही समृद्ध करती है। प्रत्येक महाविद्यालय औरों की तरह एक जैसे विषयों को पढ़ाता है और इसलिए इसे एक लघु विश्वविद्यालय कहा जाता है। वह सभी विषय पढ़ा सकने वाले योग्य शिक्षकों को रखकर गौरवान्वित होता है। अपने उपयोग के लिए अलग पुस्तकालय तथा प्रयोगशाला की व्यवस्था भी करता है। यह महाविद्यालय स्वायत्त होने पर भी आर्थिक रूप से प्रथम श्रेणी के अपेक्षित स्टाफ को रखने में बहुत समर्थ नहीं होते। महाविद्यालय के शिक्षक अपने सीमित संसाधनों के कारण असुविधा और कार्याधिक्य का अनुभव करते हैं। अधिक विषयों को पढ़ाने का दायित्व लेने के कारण विशिष्ट योग्यता असंभव हो जाती है और एक महाविद्यालय का आचार्य इन परिस्थितियों के रहते न तो विकास का अवसर पाता है और न ही अपने विस्तृत विषय की किसी छोटे पक्ष का अध्येता बनने का अवसर प्राप्त करता है। स्वायत्त और आत्मनिर्भर महाविद्यालयों की इस पद्धति के अपरिहार्य परिणामस्वरूप हमने बेचारे आचार्यों, असक्षम पुस्तकालयों और असक्षम प्रयोगशालाओं को इधर-उधर बिखेर दिया है। लेकिन, चूंकि वर्तमान संसाधन तब अपर्याप्त प्रतीत होते हैं, जब विद्यालय के आर्थिक स्रोत संबद्ध रूप से समझे जाते हैं या विविध महाविद्यालयों के बीच बांट दिए जाते हैं; यह नहीं समझना चाहिए कि महाविद्यालय के कुछ संसाधन बंबई विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर एवं स्नातक-पूर्व शिक्षण का मुकाबला करने के लिए पूरी तरह पर्याप्त नहीं हैं। उदाहरण के लिए अर्थशास्त्र शिक्षण के उद्देश्य हेतु बंबई शहर में स्थित महाविद्यालय के संसाधनों को लिया जा सकता है।
बंबई शहर में निम्नलिखित महाविद्यालयों में बंबई विश्वविद्यालय के बी.ए. पाठ्यक्रम हेतु अर्थशास्त्र में प्रशिक्षण का प्रावधान है :
(1) एल्फिंस्टन महाविद्यालय, (2) विल्सन महाविद्यालय, (3) सेंट जेवियर महाविद्यालय और (4) सिडेनहम महाविद्यालय। एल्फिंस्टन महाविद्यालय में दो व्यक्ति, दो विल्सन महाविद्यालय में, दो सेंट जेवियर में और संभवतः छह सिडेनहम महाविद्यालय में अर्थशास्त्र की शिक्षा देते हैं। कुल मिलाकर बंबई शहर में बारह व्यक्ति अर्थशास्त्र के शिक्षण में रत हैं। मुझे विश्व में ऐसे किसी भी महाविद्यालय की जानकारी नहीं है, जिसके पास एक विषय के शिक्षण हेतु इतने अधिक व्यक्ति कार्यरत हों, फिर भी आचार्यों का समूह मात्र अच्छे संगठन के अभाव में क्षीण हो गया है। विश्वविद्यालय ने इस क्षीणता को रोकने के बजाए वर्तमान समूह में दो अतिरिक्त आचार्यों को नियुक्त कर लिया है।
हालांकि यह स्वाभाविक है कि यदि ये महाविद्यालय अपने शिक्षण और पुस्तकालय