III. विश्वविद्यालय सुधार समिति - Page 349

332 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

संसाधनों के पूल बना सके, तो इससे न केवल प्रभावशाली विशेषज्ञ आचार्यों का लाभ उठाया जा सकेगा, अपितु इससे ऐसे आचार्यों का लाभ मिल सकेगा, जो स्नातक-पूर्व और स्नातकोत्तर कार्य दोनों का शिक्षण कर सकें और इस प्रकार अर्थशास्त्र की दो विश्वविद्यालयीन नियुक्तियों संबंधी विश्वविद्यालय संसाधनों का अपव्यय रोका जा सकेगा। इसके लिए और कुछ नहीं करना होगा, सिवाय इसके कि इन 12 व्यक्तियों को परस्पर जोड़ दिया जाए। विश्वविद्यालय की अर्थशास्त्र संबंधी गतिविधियों के पालन हेतु और सभी विद्यार्थियों को उस पाठ्यक्रम संबंधी भाषण देने हेतु सहमति हो और इस बात का विचार किए बिना कि वे किन महाविद्यालयों में पंजीकृत हैं। बंबई शहर के महाविद्यालयों में अन्य विषयों के शिक्षण में भी यही योजना आसानी से अपनाई जा सकती है। इस योजना के मार्ग में संभवतः एकमात्र कठिनाई विद्यार्थियों को एक महाविद्यालय से दूसरे महाविद्यालय में इन भाषणों को सुनने के लिए जाने की है। यह कठिनाई आसानी से दूर की जा सकती है। मैं यह कहना चाहूंगा कि राजनीतिशास्त्र विषयक सभी भाषण सिडेनहम महाविद्यालय में दिए जाएं। दर्शन और मनोविज्ञान विषयक सभी भाषण विल्सन महाविद्यालय में दिए जाएं तथा साहित्य और भाषाएं संबंधी सभी भाषण एल्फिंस्टन महाविद्यालय में दिए जाएं। इस व्यवस्था से विद्यार्थियों की महाविद्यालयों में बार-बार की भाग-दौड़ पूरी तरह कम की जा सकेगी। महाविद्यालयों को विषय-विशेष के व्याख्यान-सदन के रूप में घोषित कर देना चाहिए और व्याख्यान अपने-अपने महाविद्यालयों के आधार पर रहते हुए आपस में समान स्वरूप वाले दलों का निर्माण करें। महाविद्यालय जिस विषय में शिक्षा दे रहे होंगे, उन विषयों के लिए कमरे होंगे जिनमें विषय-विशेष पर संबद्ध महाविद्यालयों के पुस्तकालय का हिस्सा होगा।

मैं स्वीकार करता हूं कि विश्वविद्यालय एक केन्द्रीकृत संस्था हो और यदि एक नया विश्वविद्यालय खोलने की योजना हो, तो यह संबद्ध महाविद्यालयों के संघटक के रूप में कार्य करने वाले विश्वविद्यालय की भांति हो। किंतु यह भी स्वीकार करना होगा कि विश्वविद्यालय केवल प्रसारण माध्यम नहीं हो सकते और जहां पर महाविद्यालयीन स्तर की कुछ संस्थाएं बन रही हों, उन्हें सामान्यतः संस्था के केन्द्रीयकरण की सफलता के प्रचार हेतु बंद नहीं किया जा सकता। इस योजना के अंतर्गत न तो मैंने विश्वविद्यालय शिक्षा के स्तर को प्रस्तुत किया है और न ही महाविद्यालयों की स्वायत्तता में क्षति को रेखांकित किया है। प्रशासनिक स्तर पर महाविद्यालय स्वतंत्र बने रहते हैं। केवल शैक्षिक स्तर पर वे विश्वविद्यालय के अभिन्न अंग बन जाते हैं। संक्षेप में यह स्थिति आक्सफोर्ड और कैंब्रिज विश्वविद्यालय के समान हो जाती है, जहां विश्वविद्यालय महाविद्यालय का समूह है और महाविद्यालयों से विश्वविद्यालय बनता है, ऐसे संगठन से अधिकांश वर्तमान महाविद्यालय बनते हैं और इससे अपव्यय को समाप्त किया जाता है।