III. विश्वविद्यालय सुधार समिति - Page 351

334 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

विभिन्न भागों में इधर-उधर बिखरे हुए महाविद्यालयों की शैक्षिक मांगों को पूरा करने के बजाए इस नीति को स्वीकार करके प्रांत के अन्य भागों में अन्य विश्वविद्यालयों की शैक्षिक मांगों को पूरा करने में समर्थ होंगे। इससे संभव है, हम एक आदर्श केन्द्रीयकृत विश्वविद्यालय का लक्ष्य प्राप्त न कर सकें, किंतु कम से कम एक ऐसे जीवंत विश्वविद्यालय की उपलब्धि हो सकती है, जिसके साथ प्रांत में विश्वविद्यालय से उन सभी महाविद्यालयों को, जो बहुत निकट स्थित हैं, बौद्धिक सहयोग में परस्पर मिलने की भावना का विकास किया जा सकता है।

प्रश्न 28 : इस समय बंबई और पूना ही ऐसे स्थान हैं, जहां विश्वविद्यालयों का विकास हो सकता है और मेरा सुझाव है कि इन दोनों स्थानों पर तत्काल अलग- अलग विश्वविद्यालय स्थापित कर दिए जाएं। निकट भविष्य में अहमदाबाद को भी विकसित किया जाए। वहां पहले से ही एक कला महाविद्यालय और एक विज्ञान संस्थान है और उसे बड़ी सरलता से विश्वविद्यालय में बदला जा सकता है। जिन केंद्रों का ऊपर उल्लेख किया गया है, वहां विश्वविद्यालयों की स्थापना के विचाराधीन बंबई, पूना और अहमदाबाद के तीन विश्वविद्यालय लंदन विश्वविद्यालय की तरह ही हो सकेंगे, जहां अन्य महाविद्यालयों के विद्यार्थियों को अपनी परीक्षाएं देने पर उपाधियां मिल सकेंगी।

यदि इस प्रांत में भावी विश्वविद्यालयों की स्थापना केन्द्रीयकृत संस्थाओं का रूप ले लें, तब इन प्रश्नों पर उठाई गई समस्याएं समाप्त हो जाएंगी। उस स्थिति में विश्वविद्यालय अपने शिक्षकों और शिक्षण प्रबंध पर पूरा नियंत्रण रखेगा। किंतु मैं यह मानूंगा कि हमारे भावी विश्वविद्यालय अपनी व्यवस्था में स्वतंत्र संबद्ध महाविद्यालयों के समूह रूप में हों। किसी भी रूप में यह बंबई और पूना के नए विश्वविद्यालयों में होगा। संबद्ध महाविद्यालयों की योजना के अंतर्गत महाविद्यालय विश्वविद्यालय द्वारा मान्य शिक्षा देने के अधिकारी होंगे। इस रूप में अंतर महाविद्यालयीन शिक्षण की योजना से संबद्ध महाविद्यालयों द्वारा दोहरा अपव्यय और संसाधनों का दुरुपयोग समाप्त हो सकेगा। परंतु इसके साथ यह भी सोचना होगा कि क्या ये प्रबंध विश्वविद्यालय शिक्षा के उच्च स्तर को कायम रख सकेंगे। यह विश्वविद्यालय शिक्षा देने के लिए नियुक्त शिक्षकों के स्तर पर निर्भर करता है। इस समय शिक्षक महाविद्यालयों से संबद्ध हैं और उनका वेतन तथा स्तर महाविद्यालय के शासी प्राधिकारियों द्वारा नियंत्रित किया जाता है। परंतु ऐसा नहीं लगता कि महाविद्यालय बहुत योग्य व्यक्तियों को नियुक्त करते हों या उनके स्तर, अवधि, वेतन और पदोन्नति को इस रूप में नियंत्रित करते हों, जिससे स्टाफ के उत्तम और बहुत योग्य सदस्य के रूप में उनके सामने एक सुंदर भविष्य खुलता हो। सरकार द्वारा निर्धारित सारा शैक्षिक कार्य तीन स्तरों में शैक्षिक सेवाओं को दिया जाता, जिसमें सभी प्रशासनिक और निरीक्षण अधिकारी, सरकारी महाविद्यालयों और विद्यालयों के अत्यधिक जिम्मेदार वे कनिष्ठ सभी शिक्षक