III. विश्वविद्यालय सुधार समिति - Page 352

विश्वविद्यालय सुधार समिति

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शामिल हैं। सभी सेवाओं में वरिष्ठता का सिद्धांत गंभीरता से जुड़ा हुआ है। इस कारण यह बहुत अच्छी परंपरा ही बन गई है कि सारे उच्च पद वरिष्ठता के आधार पर दिए जाएंगे। जहां तक विश्वविद्यालय शिक्षा का प्रश्न है, इस पद्धति की मुख्य कमी यह है कि पारितोषिक विद्वता के आधार पर न होकर केवल दीर्घ सेवाकाल के आधार पर निर्धारित होते हैं। महाविद्यालय के शिक्षकों की, जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित किए जा सकने की शर्त से युक्त होते हैं, जैसा कि सरकारी सेवारत सदस्यों के मामले में होता है, महाविद्यालय के प्रति वह निष्ठा और आज्ञापालन भावना नहीं हो सकती, जो अपनी सेवा में होती है और कभी-कभी अपनी उस महत्त्वाकांक्षा में जिसमें वह सेवा के दौरान पदोन्नति प्राप्त करते हैं इससे उनके द्वारा शिक्षा का वह स्तर नहीं बन पाता, जिससे उनका नाम जुड़ा हुआ हो और परिचित हो सके। इस सेवा पद्धति की दूसरी कमजोरी है, आई.ई.एस. और पी. ई.एस. के बीच किया गया, आपत्तिजनक विभाजन, जिसमें शिक्षण क्षेत्र में एक बहुत कनिष्ठ सदस्य भी अपने आपको वरिष्ठ तथा महत्त्वपूर्ण समझने लग जाता है। इससे अलगाव का तत्त्व उपस्थित होता है, जो महाविद्यालय के शिक्षकों के बीच परस्पर मैत्रीपूर्ण, स्वतंत्र और सहयोगी वातावरण में बाधा पहुंचाता है, जो किसी भी शैक्षिक संस्था के बौद्धिक जीवन को बढ़ावा देने के लिए अनिवार्य और अंत में यह कहा जा सकता है कि वर्तमान अवस्था में सरकारी महाविद्यालयों के आचार्य सरकारी सेवा में होने के कारण अपने विद्यार्थियों का विश्वास खो चुके हैं। विद्यार्थी अपने आचार्यों को अपने बौद्धिक नेता के रूप में सम्मान करने के बजाए सरकार के अभिकर्ता समझते हैं और आचार्य अपने विद्यार्थियों से कोई विशेष सम्मान प्राप्त नहीं कर पाते, उनकी सद्भावना को जीतने का प्रयास भी नहीं करते। मिशनरी संस्थाओं द्वारा संचालित महाविद्यालयों में स्टाफ के प्रमुख सदस्य यूरोप के मिशनरी होते हैं। शेष स्टाफ में भारतीय शिक्षक होते हैं। वहां आई.ई.एस. और पी.ई.एस. का विभाजन छोटे स्तर पर ही होता है हालांकि वह किसी स्पष्ट मतभेद को महत्त्व नहीं देता। सोसाइटी द्वारा संचालित प्राइवेट महाविद्यालयों में जैसे ‘दक्कन एजूकेशन सोसाइटी’ के स्टाफ के सभी सदस्य सोसाइटी के सदस्य हैं। यहां का स्टाफ अधिक आत्मीय संबंधों से युक्त होता है और उससे संगठन में कोई मतभेद नहीं होता। परंतु इन महाविद्यालयों का संविधान ऐसे नियुक्त शिक्षकों को सोसाइटी का आजीवन सदस्य बनने से रोकता है, जो उन्हें नियंत्रित करती हैं। मैं यह बहुत निश्चित रूप से नहीं कह सकता कि इन प्राइवेट महाविद्यालयों द्वारा दिया जाने वाला भविष्य कैसा है, परंतु यह निश्चित है कि सरकारी महाविद्यालयों में निम्नतम श्रेणी से तुलना करने पर भी वे निम्न स्तर के होते हैं और वे वास्तव में इतने निम्न स्तर के हैं कि आधुनिक योग्यता वाले व्यक्तियों को आकर्षित नहीं कर पाते, जबकि निष्काम भावना के द्वारा उसे बनाया जा सकता है। इसके बावजूद इन सब में अरुचि का एक बहुत बड़ा भाग भी होता है। किंतु