336 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
यह केवल प्राइवेट महाविद्यालय ही नहीं है, जो सही व्यक्तियों से अपने रिक्त पदों को भरने में असफल होते हैं। यहां तक कि सरकारी महाविद्यालय भी अपने सर्वोतम प्रयासों के बावजूद कभी-कभार ही उचित व्यक्ति नियुक्त करने में सफल रहते हैं। इसका एक कारण यह है कि उनके पास चयन की कोई न्यायोचित पद्धति नहीं है। सरकारी महाविद्यालयों के मामले में निदेशक, सार्वजनिक अनुदेश या सरकार का सचिव नियुक्त करते हैं, किंतु वास्तव में इस प्रकार की नियुक्तियों के लिए वे पूरी तरह अदक्ष व्यक्ति होते हैं। इसी प्रकार प्राइवेट महाविद्यालयों की नियुक्तियां भी महाविद्यालयों के अध्यक्षों द्वारा होती हैं, जो सही नियुक्ति करने में असमर्थ होते हैं। दोष इस बात में है कि एक व्यक्ति की नियुक्त जिस विषय में की जा रही है, उसे नियुक्त करने के लिए उस विषय का अधिकारी नहीं है। जबकि होना यह चाहिए कि एक अर्थशास्त्री ही अर्थशास्त्री की नियुक्ति करे।
हालांकि इन कठिनाइयों व कमियों के बावजूद अभी ऐसा कोई संभावित उपाय दिखाई नहीं देता, जिसके आधार पर विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों के आपसी संबंधों के स्तर पर इसके सदस्यों या इनके वितरण के संबंध में स्टाफ की भर्ती हो सके जो विश्वविद्यालय की आवश्यकता को पूरा हो सके। विश्वविद्यालय अपने पास एक ही विषय के कम से कम आधा दर्जन आचार्यों की नियुक्ति करता है, जबकि दूसरे महत्त्वपूर्ण विषय की एक भी नियुक्ति नहीं होती। विश्वविद्यालय संगठन इस आधार पर नहीं चलाया जा सकता है और जो कठिनाइयां ऊपर कही गई हैं, वे केवल विश्वविद्यालय द्वारा ही नियुक्तियां अपने हाथ में लेने के साथ दूर हो सकती हैं, जो शैक्षिक परिसर ‘देखें नए विश्वविद्यालय का संविधान’ से पास हों या कम से कम नियुक्तियों में विश्वविद्यालयों को अपना दृष्टिकोण रखने और मत देने का अवसर दिया जाए।
इसलिए मैं प्रस्तावित करता हूं कि शैक्षिक सेवा की महाविद्यालयीन शाखा को प्रशासनिक शाखा से अलग कर देना चाहिए और इसे सीधे ही उचित संरक्षण सहित विश्वविद्यालय के अंतर्गत कर दिया जाए। दूसरे शब्दों में, विभिन्न महाविद्यालयों में शिक्षकों के पदों को कुछ संस्थाओं से संबद्ध व समर्थित विशेष शिक्षा पीठों में बदल दिया जाए जैसा कि वर्तमान मामले में प्राइवेट और सरकारी महाविद्यालय द्वारा किया गया है परंतु इन पीठों की नियुक्तियां विश्वविद्यालय की देखरेख में होनी चाहिए।
मैं शैक्षिक वर्ग की नियुक्ति के संदर्भ में विश्वविद्यालय के नियंत्रण को बहुत महत्त्वपूर्ण मानता हूं। यहां तक कि बंबई विश्वविद्यालय ने विश्वविद्यालय शिक्षा का एक स्तर परीक्षा की कठोर पद्धति व जांच संबंधी शक्ति के रूप में बनाए रखा है। धीरे-धीरे उसके स्नातकों का स्तर कम होता जा रहा है। यह सिद्धांत रूप से एक बड़ी गलती के रूप में विश्वविद्यालय को प्रारंभ करने वाले बड़े शिक्षाविदों के ऊपर है, जिन्होंने दूसरे स्तरों की खोज न करके केवल यही माना है कि विश्वविद्यालय का शिक्षा स्तर मात्र उन विद्यार्थियों को कठोरतापूर्वक हटाने से संभव है, जो विश्वविद्यालय अध्ययन