III. विश्वविद्यालय सुधार समिति - Page 355

338 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

विचार कर सके जो बंबई विश्वविद्यालय को शैक्षिक विश्वविद्यालय में परिवर्तित करने में सहायक हों। बंबई विश्वविद्यालय के वर्तमान संविधान में अपेक्षित और स्पष्ट रूप से उन तीन आवश्यक संकायों का प्रावधान नहीं है, जिनका एक शैक्षिक विश्वविद्यालय के रूप में ठीक ढंग से कार्य करने के लिए मैंने उल्लेख किया है। बंबई विश्वविद्यालय की वरिष्ठ परिषद बंबई के जीवन और हितों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं करती। सिंडीकेट के पास वे उत्तरदायित्व और शक्तियां नहीं हैं जो एक बड़े विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद के विकास में योग दे सके और अपने कर्तव्य प्रायः उसे सौंप दें, जिन्हें निभाने के लिए वह पूरी तरह अक्षम है। जबकि शैक्षिक वर्ग, जो वास्तव में विश्वविद्यालय का हृदय होता है; के पास व्यावहारिक रूप में कोई अधिकार नहीं होता, केवल अधिकारी ही विश्वविद्यालय के शैक्षिक मामलों में निर्देश देते हैं।

बंबई विश्वविद्यालयों को एक शैक्षिक विश्वविद्यालय बनाने के संबंध में सबसे पहले मैं निकायों के गठन की बात करूंगा। इस उद्देश्य के लिए बंबई शहर में स्थापित महाविद्यालयों के बीच अंतर-महाविद्यालयीन शिक्षण की मेरी योजना स्वीकार की जाए। इस योजना के अंतर्गत महाविद्यालयों में कराया जा रहा विभिन्न विषयों का शिक्षण स्वाभाविक रूप में विभागों में बदल दिया जाएगा, जैसे अर्थशास्त्र, इतिहास, राजनीतिशास्त्र, प्रशासन, विधि, साहित्य, भाषाएं, रसायन शास्त्र, भौतिकी आदि। यह बात स्वीकार करनी होगी कि एक विश्वविद्यालय से विद्यार्थी अपनी अंतिम क्रमबद्ध तैयारी के बाद जीवन के एक या कई क्षेत्रों में काम कर सके, जो किसी भी अवस्था में विश्वविद्यालय शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए — सबसे प्रमुख और प्राथमिक उद्देश्य।

इसमें सफल होने के लिए यह आवश्यक है कि ज्ञान की उन विभिन्न शाखाओं को एकत्रित करना होगा, जिन्हें विद्यार्थी लेना चाहते हैं। इससे न केवल विद्यार्थियों की मांग ही पूरी होगी, अपितु शिक्षकों की आवश्यकता को भी कुछ दिशाओं में पूरा किया जा सकेगा। यह स्वाभाविक है कि ज्ञान की कुछ शाखाओं में परस्पर गहरा संबंध है और उनके उन दृष्टिकोणों में बहुत समानता है, जहां वे एक-दूसरे के पर्याप्त निकट हैं। यह निकटता शिक्षकों और शिष्यों से प्रकट होगी, जो हर ओर धीरे-धीरे ज्ञान के विविध विभागों के समूह के रूप में संकाय कही जाएगी। इसलिए यदि हमारे विश्वविद्यालय को एक शैक्षिक विश्वविद्यालय बनाना है, तो मैं सुझाव देता हूं कि नए बंबई विश्वविद्यालय में विभागों को संकायों के रूप में वर्गीकृत कर दिया जाए और संकायों को विश्वविद्यालय संगठन का आधार बनाया जाए। एक संकाय में पूरी तरह से या अधिकांश रूप में संकाय के अंतर्गत आने वाले विषयों के आचार्य और सहायक आचार्य होंगे और अन्य शिक्षक तथा अधिकारीगण इस रूप में विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त किए जा सकते हैं, जैसे कि संकाय सहयोजित करना चाहे। उपकुलाधिपति प्रत्येक संकाय का पदेन सदस्य होगा। एक संकाय के पास निम्नलिखित विनियम बनाने की शक्ति होनी चाहिए —