विश्वविद्यालय सुधार समिति
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(1) ऐसी समितियों की नियुक्तियां, जो संकाय में बाहरी व्यक्तियों के साथ अध्ययन
मंडल की स्थापना कर सकें और अन्य उद्देश्यों के लिए कार्य कर सकें;
(2) संकाय के कार्य-क्षेत्र में आने वाली उपाधियों, डिप्लोमा और अन्य विशेष
योग्यताओं को देने के संबंध में स्थितियों का सामान्यतः निर्धारण;
(3) संकाय के कार्य-क्षेत्र में आने वाले विषयों में विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों
द्वारा लिए गए अध्ययन पाठ्यक्रम का सामान्यतः निर्धारण;
(4) संकाय के कार्य-क्षेत्र में आने वाले विषयों के बारे में शिक्षण व परीक्षा की
विधि और पद्धति का सामान्यतः निर्धारण।
मैं फिर यह कहना चाहूंगा कि यदि संकाय को ऊपर उल्लिखित शक्तियां दी गईं और शिक्षकों को एक ही प्रकार के समन्वित पाठ्यक्रम को पढ़ाने की बाध्यता तथा एक सामान्य परीक्षा पद्धति से मुक्त किया गया, तो यह निश्चित करना आवश्यक है कि शिक्षक उस कार्य को पूरा करेंगे, जो उन्हें सौंपा जाएगा।
संकाय विश्वविद्यालय के वैधानिक अंग होने चाहिएं। विश्वविद्यालय के अकादमिक व शैक्षिक कार्य को संभालने वाले संकायों को बनाने के पश्चात् हमें विश्वविद्यालय के प्रशासनिक कार्य को संभालने के लिए एक केन्द्रीय शासी निकाय का गठन करना चाहिए। यह निकाय बंबई विश्वविद्यालय की वर्तमान वरिष्ठ परिषद के साथ पत्र-व्यवहार रखेगी, किंतु अपने स्वरूप और संरचना में पूरी तरह से अलग होगी। मेरे विचार में सीनेट विश्वविद्यालय की सर्वोच्च शासी निकाय के अपने स्वरूप में प्रमुखतया अव्यावसायिक होने के कारण एक बड़ी निकाय तो होगी ही, उसमें स्नातकों और शिक्षकों के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे। इस प्रकार की सरकारी प्रणाली के लाभ स्पष्ट हैं। एक बृहत सीनेट के माध्यम से उसमें अनेक प्रभावशाली नागरिक हों, जो अपनी व्यक्तिगत क्षमता के कारण उसमें लिए गए हों और नगर, नगरपालिका, प्रशासनिक, वाणिज्यिक, विधिक, वैज्ञानिक क्षेत्र आदि के महत्त्वपूर्ण हितों को ध्यान में रखने वाले प्रतिनिधि हो, तथा विधान परिषद, विधान सभा और राज्य परिषद के सदस्य विश्वविद्यालय के संपर्क में लाए जाएं और जो समग्र रूप में विश्वविद्यालय तथा जनता के बीच एक तारतम्य बना सकें। इस प्रकार की सीनेट विश्वविद्यालय से अधिकार व सफलतापूर्वक पूरा समर्थन लेने में सक्षम होगी और संपूर्ण शहर विश्वविद्यालय की सफलता के लिए स्वयं को तत्पर रखेगा।
परंतु 1902 के विश्वविद्यालय आयोग ने इस योजना में यह कमी बताई है कि विश्वविद्यालयों की वरिष्ठ सभाएं संख्या में बहुत बड़ी हो गई हैं (1900 में बंबई विश्वविद्यालय की वरिष्ठ सभा में 305 सदस्य थे) और ये सभी शैक्षिक मामलों में समुचित नियंत्रण नहीं कर पा रही हैं। उस आयोग ने यह नहीं समझा कि वरिष्ठ सभा का समुचित कार्य शिक्षा का नियंत्रण करना नहीं था, अपितु विश्वविद्यालय को जनता की विभिन्न अपेक्षाओं से अवगत किए रखना था। ऐसे कार्य होने के कारण