III. विश्वविद्यालय सुधार समिति - Page 357

340 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

ही वरिष्ठ सभा की रचना व्यापक और वैविध्ययुक्त ही होगी। मैं यह प्रस्तावित करता हूं कि बंबई विश्वविद्यालय की सीनेट में कम से कम 150 सदस्य हों। विश्वविद्यालय अधिनियम 1904 के अंतर्गत एक बहुत महत्त्वपूर्ण संशोधन यह किया गया कि सामान्य विद्वानों की संख्या के दो बटा पांच व्यक्ति शिक्षण क्षेत्र से लिए जाएं। पूर्व पद्धति से हटकर आने वाले की अर्हताओं को ध्यान में रखे बिना सम्मानार्थ अध्येतावृत्तियां प्रदान करने को अभिनंदनीय माना गया। परंतु इस प्रस्ताव के आलोक में मैं संकायों को बहुत अधिक सांविधिक शक्तियां देने के पक्ष में हूं। मैं नहीं समझता कि विश्वविद्यालय के शिक्षक सीनेट में बहुत अधिक प्रतिनिधित्व की आवश्यकता रखते हैं, बल्कि प्रत्येक संकाय के पास एक प्रवक्ता उपलब्ध कराना पर्याप्त है। इसलिए मैं प्रस्तावित करता हूं कि संकाय अध्यक्षों के लिए शिक्षकों के प्रतिनिधित्व को रोका जाए। सीनेट का शेष भाग राजनीतिक या व्यावसायिक क्षेत्र के व्यक्तियों से बनाया जाए। शिक्षा में रुचि विश्वविद्यालय को वास्तविक सेवा देगी।

सीनेट का प्रमुख कार्य विधि-निर्माण होगा —

  1. विश्वविद्यालय शासन को प्रभावित करने वाली संविधियां बनाना और संकल्प

पारित करना,

  1. सभी मानद उपाधियां प्रदान करना,

  2. संबद्ध महाविद्यालयों या विश्वविद्यालय के विभागों में प्रवेश के लिए अनुमोदन

देना,

  1. कोई भी नई उपाधि, डिप्लोमा या प्रमाणपत्र प्रारंभ करना,

  2. संकायों के बीच के विवादों का निर्णय करना।

एक तो विश्वविद्यालय का शासन देखने के लिए और दूसरे इसके शैक्षणिक कार्य व्यापार की देखभाल के लिए, दो निकायों के प्रबंध के पश्चात् अब हमें एक तीसरे निकाय की व्यवस्था करनी है, जो लक्ष्य प्राप्ति के लिए साधनों के प्रावधान एवं उनके समायोजन के कार्य से युक्त होगा। दूसरे शब्दों में, विश्वविद्यालय की एक केंद्रीय कार्यकारिणी अवश्य होनी चाहिए। यह निकाय बंबई विश्वविद्यालय के वर्तमान सिंडीकेट की तरह तो हो, किंतु अपने स्वरूप एवं संरचना में उससे पूर्णतः भिन्न हो। अपनी संरचना और कार्य की शर्त, दोनों ही रूपों में सिंडीकेट सभी विश्वविद्यालय के निकायों में सबसे कम संतोषजनक है। सर्वोच्च कार्यकारिणी होने के नाते सिंडीकेट के अधिकार में सामान्य मुहर एवं उसका उपयोग, विश्वविद्यालय के संपूर्ण राजस्व व संपत्ति का प्रबंध तथा (अन्य रूप में प्रदत्त को छोड़कर) विश्वविद्यालय के सभी मामलों का संचालन होना चाहिए। परंतु इसके बजाए सिंडीकेट के कार्य व्यापार को अति विस्तृत क्षेत्र में फैला दिया गया है, जिसका अधिकांश भाग सुविधापूर्वक अन्य एवं अधिक उपयुक्त निकायों को सौंपा जा सकता है। कथित कार्यकारिणी वर्तमान पद्धति तथा सुविचारित निर्णय करने के बजाए बहस करने के कार्य पर ही केंद्रित