III. विश्वविद्यालय सुधार समिति - Page 360

विश्वविद्यालय सुधार समिति

के लिए अर्हताएं और इन उपाधियों को देने के संबंध में अपनाए जाने वाले

उपाय।

(4) संबद्ध महाविद्यालय का निरीक्षण।

(5) महाविद्यालयों की संबद्धता एवं असंबद्धता।

(6) अध्येतावृत्ति, छात्रवृत्ति, प्रदर्शनी और आर्थिक तथा अन्य सहायता की

अवधि।

(7) स्नातकों एवं स्नातक-पूर्वों के बारे में विश्वविद्यालय के अधिकार क्षेत्र में

आने वाले अनुशासन का लागू किया जाना।

(8) सीनेट में हुई अपील के परिप्रेक्ष्य में स्नातकों एवं स्नातक-पूर्वों को

विश्वविद्यालय की सदस्यता से वंचित करना, उपाधियों, डिप्लोमा,

प्रमाणपत्रों, विशेष योग्यताओं की वापसी। विद्या परिषद के सलाहकारी

कार्य इस प्रकार होंगेः

(1) विद्या परिषद से रिपोर्ट देने के लिए आग्रह किए बिना और उस

रिपोर्ट की प्राप्ति के बिना, स्नातक-पूर्व एवं स्नातकोत्तर दोनों वर्गों की

विश्वविद्यालयीन शिक्षा के संगठन, सुधार और विस्तार से संबंधित किसी

भी विषय पर सिंडीकेट कोई भी निर्णय नहीं लेगा।

(2) विद्या परिषद से रिपोर्ट देने के लिए आग्रह किए बिना और उस रिपोर्ट

की प्राप्ति के बिना सिंडीकेट संकायों के लिए सामान्य निर्देश जारी नहीं

करेगा या किसी अन्य संकाय की अपील पर वह किसी संकाय समिति या

मंडल के कार्य की, ऐसे निकायों के पदाधिकारी या प्रतिनिधि के निर्वाचन

को छोड़कर, समीक्षा नहीं करेगा या उसे भविष्य के कार्य के लिए निदेश

भी नहीं देगा।

(3) विद्या परिषद से रिपोर्ट देने के लिए आग्रह किए बिना एवं उस रिपोर्ट

की प्राप्ति के बिना सिंडीकेट शैक्षिक वर्ग की कोई नियुक्ति नहीं करेगा।

सीनेट, सिंडीकेट एवं विद्या परिषद की संरचना एवं शक्ति वैसी ही होनी चाहिए, जैसी कि कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग ने ‘न्यू कलकत्ता यूनिवर्सिटी’ के लिए प्रस्तावित की है। मैं समझता हूं कि नामों में परिवर्तन करना और अच्छा होगा। नए विश्वविद्यालय की वरिष्ठ सभा को ‘कोर्ट’ तथा सिंडीकेट को ‘स्टेट’ के नाम से पुकारा जाना अधिक अच्छा होगा। मैं यह प्रस्ताव भी रखता हूं कि वायसराय को विश्वविद्यालय का कुलाध्यक्ष होना चाहिए।

प्रश्न 16 : बंबई विश्वविद्यालय बहुत अच्छी तरह से (क) परीक्षाओं के संचालन, (ख) पाठ्यक्रम के निर्धारण, और (ग) पाठ्य-पुस्तकों के निर्धारण संबंधी कार्यों को पूरा कर रहा है। परंतु ऐसा लगता है कि शिक्षक और शिक्षार्थियों पर पड़ने वाले इस सबके हानिकारक प्रभाव की ओर विश्वविद्यालय ने कभी ध्यान नहीं दिया। विश्वविद्यालय के शिक्षक जिस ढंग से पढ़ाना सर्वोत्तम समझें, उसके लिए उन्हें