III. विश्वविद्यालय सुधार समिति - Page 361

344 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

स्वतंत्रता कैसे प्राप्त हो तथा उन्हें किसी कठिन पाठ्यक्रम में न बांधा जाए। यह ऐसी समस्या है, जिसे इस समिति द्वारा हल की जाने वाली सभी समस्याओं में सबसे आगे रखना चाहिए। यदि शिक्षकों के लिए स्वतंत्रता प्राप्त हो सकेगी तो विद्यार्थियों के लिए भी स्वतंत्रता आएगी। इस उद्देश्य के लिए विश्वविद्यालय के शिक्षकों का, समुचित पूर्वोपायों के साथ ही, अपने विद्यार्थियों की शिक्षा एवं परीक्षा पर संपूर्ण नियंत्रण होना चाहिए और इस कार्य को संभव बनाने के लिए विश्वविद्यालय को भी उसी प्रकार संस्थापित करना होगा।

प्रश्न 17 : परीक्षा के अतिरिक्त, महाविद्यालयों में विद्यार्थियों के अन्य कार्यों पर भी विचार करना चाहिए। उच्चतर उपाधियों के लिए शोध-प्रबंध और मौखिक परीक्षाएं भी होनी चाहिए।

प्रश्न 18 और 19 : बंबई विश्वविद्यालय को संपूर्ण विश्वविद्यालय बनाने के लिए इसमें अभियांत्रिकी, कृषि, ललित कलाएं, प्रौद्योगिकी और संगीत के भी संकाय होने चाहिए।

प्रश्न 20 : स्नातकोत्तर उपाधियों के लिए अध्ययन-अवधि चार वर्ष की होनी चाहिए (ऐसा मैं केवल सामाजिक विज्ञानों के लिए बता रहा हूं)। दो-दो वर्षों के दो चरण हों। प्रथम चरण के समाप्त होने पर अभ्यर्थी एम.ए. की उपाधि का हकदार हो जाना चाहिए। उसे अपने अत्यधिक रुचि वाले केवल एक विषय में ही विशेषज्ञता प्राप्त करनी चाहिए। जांच के लिए एक लिखित परीक्षा होनी चाहिए, जिसमें लगभग 75 पृष्ठ का एक टंकित निबंध भी हो, जो मूल स्रोतों के उपयोग करने एवं उस पर आलोचना कर सकने की कला में उसकी दक्षता दिखाता हो। दूसरे चरण की समाप्ति पर अभ्यर्थी पी-एच.डी. की उपाधि का हकदार हो जाना चाहिए। इसकी जांच में मौखिक परीक्षा हो तथा प्रकाशन योग्य बड़े और अच्छे आकार का एक शोध प्रबंध भी होना चाहिए। एम.ए. में लिए गए सर्वाधिक रुचि वाले विषय के अंतर्गत किसी विशेष क्षेत्र में अभ्यर्थी द्वारा किए गए शोध इसमें शामिल होंगे। इसके अतिरिक्त अभ्यर्थी उन दो विषयों के लिए; जो उसके सर्वोत्तम रुचि वाले तथा कम रुचि वाले विषय से संबंधित होंगे; अपने-आपको एक मौखिक परीक्षा हेतु प्रस्तुत करेगा। यह व्यवस्था विशेषज्ञता को विस्तृत आधार देगी।

प्रश्न 21 : इस प्रकार की कुछ उपाधियों का होना अच्छा हो सकता है।

प्रश्न 22 : आर्थिक सहायता, छात्रवृत्ति एवं अध्येतावृत्ति के द्वारा।

प्रश्न 23 : विश्वविद्यालय मुद्रणालय एवं प्रकाशन विभाग का होना परमावश्यक है। इसके अभाव में स्नातकोत्तर कार्य में बहुत बाधा पहुंचेगी।

प्रश्न 24 : प्रश्न 11-13 के उत्तर देखें।

प्रश्न 30 : बंबई विश्वविद्यालय को बंबई तक ही स्वयं को सीमित रखना चाहिए। नए विश्वविद्यालय अपने-अपने विभाग खोलें। किंतु यदि नए विश्वविद्यालय की रचना