1. बजट पर चर्चा - Page 37

20 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

बहुत तेजी से कर रहे हैं और सरकार को आशा है कि इनके निश्चित निष्कर्षों को अगला बजट प्रस्तुत करने से पहले इस सदन में घोषित कर दिया जाएगा। मुझे आशा है कि आज मैंने जो कुछ कहा है, उसमें ऐसा कुछ नहीं है कि जिससे कोई यह कहे कि सरकार सामाजिक उपयोगिता की योजनाओं के लिए नए करों का प्रस्ताव करने के लिए तैयार नहीं है। अगर किसी की ऐसी धारणा बनती है, तो उसमें सच्चाई नहीं है। वैसे तो इस प्रांत में कराधान की दर बहुत ऊंची है। हमारे सामने यह बात साफ है कि अधिकांश करों का बोझ इस प्रांत में गरीबों को ही उठाना पड़ता है। भू-राजस्व, उत्पाद शुल्क, स्टाम्प फीस, कोर्ट फीस, सार्वजनिक वाहनों पर कर, देसी तंबाकू पर कर, अधिकांशतः गरीबों को ही देने होते हैं। बस आयकर ही है, जिसे संपन्न लोग देते हैं, और वह इस समय प्रांतीय सरकार के कार्य-क्षेत्र में नहीं आता। एक ओर गरीब लोग हैं, जो इस सरकार को अधिकांश कर देते हैं और दूसरी ओर संपन्न लोग हैं, जो केन्द्र सरकार को आयकर देते हैं। इन दोनों के बीच में काफी लोग हैं, जिन्हें अपने प्रांत के वित्तीय दायित्व का एक हिस्सा तो देना ही चाहिए। धन-संपन्न लोग प्रांतीय राजस्व के लिए जो कुछ दे रहे हैं, वह अपर्याप्त है। इसलिए वे आगे आकर अपने उचित हिस्से का भार संभालें। हम बहुत सी पाबंदियों से बंधे हुए हैं और यह आसान काम नहीं है कि हम ऐसे कर खोज निकालें, जो उन कर देने योग्य लोगों पर लगें, जो अब तक कर नहीं दे रहे हैं। मैं आज इस स्थिति में नहीं हूं कि भावी निर्णयों की पूर्वकल्पना कर सकूं। बस, मैं इतना ही कह सकता हूं कि हम बहुत से प्रस्तावों की संभावनाएं खोज रहे हैं, जिसे इस सदन में प्रस्तुत किया जा सके। केवल ऐसे प्रस्ताव नहीं जिनसे हमें मद्यनिषेध से हुए घाटे को पूरा करने के लिए आवश्यक धन मिले, बल्कि साथ में हम अपनी योजनाओं को विस्तृत कर सकें, हालांकि उतना विस्तार तो नहीं कर सकते, जितना हम व्यापक अर्थों में समाज सेवा के बहुत से क्षेत्रों में करना चाहते हैं।

महोदय! इसके बाद उन्होंने अपना यह विचार भी प्रस्तुत किया : साधनों में वृद्धि करने के उद्देश्य से एक और दिशा में भी सरकार की गतिविधियों को बढ़ाया जा सकता है। बहुत सी जनोपयोगी सेवाएं हैं, जिन्हें आज पूरे समाज की कीमत पर कुछ लोगों के लाभ के लिए चलाया जा रहा है। ऐसा कोई कारण नहीं है, जो सरकार को इन सेवाओं का राष्ट्रीयकरण करने से रोक दे और उनसे होने वाले लाभ को पूरे समाज के हित में लगा दे। जैसे बिजली की आपूर्ति को ही लें। यह काम निजी एजेंसियां सरकार के संरक्षण में करती हैं और सरकार ही जनता की ओर से उन्हें संरक्षण दे सकती है। ऐसा कोई उचित कारण नहीं है कि इस जनोपयोगी गतिविधि के लाभों को मान्यता प्राप्त एजेंसी, यानी सरकार के माध्यम से क्यों न समस्त जनता को वापस कर दिया जाए। अब तक इस दिशा में कोई काम नहीं हुआ है। आय के और भी बहुत से संभावित स्रोत हैं,