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बजट पर चर्चा

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जिन्हें सरकार न्यायोचित रूप से अपने हाथ में ले सकती थी, जिनका या तो

उपयोग नहीं किया गया, या जिन्हें केवल कुछ लोगों के लाभ के लिए इस्तेमाल

होने दिया गया है। अभी बहुत बड़ा क्षेत्र बचा है जिसका पता हमें लगाना चाहिए,

ताकि उस क्षेत्र में सरकार की गतिविधियों को बढ़ाया जा सके। सरकार को

विश्वास के साथ जनहित के संभाव्य स्रोतों के रूप में इस प्रकार की गतिविधियों

के बारे में पता लगाना चाहिए।

क्या इस नए बजट भाषण में ऐसा कुछ है, जिसे मेरे माननीय मित्र ने प्रस्तुत किया है? उन्होंने अपने ही शब्दों को वापस ले लिया है। उन्होंने अपने पूर्व बजट भाषण का कोई भी संकेत नहीं दिया है। उनसे मेरा प्रश्न है : उन्होंने अपने शब्दों की क्यों उपेक्षा की है? उन्हें ऐसा करने के लिए किसने विवश किया है?

माननीय सदस्य : वल्लभभाई, शेगांव।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : इसके पीछे अवश्य कोई है, लेकिन मैं इस बात की तह में नहीं जाना चाहता। तो भी मैं एक बात कहना चाहता हूं और पूरी ईमानदारी के साथ कहना चाहता हूं। मेरे माननीय मित्र को इसके लिए बधाई दी गई है कि उन्होंने कोई नया कर नहीं लगाया है। लेकिन मैं स्वयं अपनी तरफ से सबसे बड़ा आलोचक हूं कि उन्होंने नए कर नहीं लगाए। इसलिए मैं कहता हूं कि यह बजट संपन्न व्यक्तियों के लिए है। यह गरीब आदमी का बजट नहीं है। गरीब आदमी को तो अधिक से अधिक राहत चाहिए। संपन्न व्यक्ति तो सरकार से स्वतंत्र रहकर भी अपना गुज़ारा कर सकता है। अमीर आदमी को स्कूल की जरूरत नहीं है। वह स्कूल मास्टर अपने घर पर रख सकता है और वह अपने बेटे को स्कूल और कॉलेज भेजे बिना बी.ए. तक की शिक्षा दे सकता है। अमीर आदमी को औषधालय की जरूरत नहीं है। वह डॉक्टर को अपने घर पर ही बुला सकता है और उसे 30 रुपए देकर अपनी, पत्नी तथा बच्चों की बीमारी की जांच करा सकता है। यह तो गरीब आदमी ही है, जो चाहता है कि सरकार सहायता के लिए आगे आए। गरीब आदमी को ही

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अधिक सेवा की आवश्यकता पड़ती है। कोई भी सार्थक सरकार, कोई भी सरकार जो अपने दायित्वों के प्रति गंभीर है, गरीबों से यह नहीं कह सकती कि वह उन्हें ये

सुविधाएं नहीं दे सकती, क्योंकि उसमें कर लगाने का साहस नहीं है। ऐसी सरकार

जितनी जल्दी सत्ता को छोड़ दे, उतना ही अच्छा है।

माननीय श्री मोरारजी आर. देसाईः यही तो मुश्किल है।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : मैं एक और मुद्दे को उठाना चाहता हूं। मैं नहीं जानता कि इस सदन के कितने सदस्य मेरी इस बात से सहमत होंगे, लेकिन मेरा पक्का विचार है कि भारत में जितनी सरकारें हैं, चाहे वह किसी भी प्रांत की हों, वे कभी अच्छा काम नहीं कर सकेंगी, अगर उनका ध्यान, मात्र जिनको यूरोपीय देशों में समाज सेवाएं कहते हैं, तक ही सीमित है। मैं यह मानता हूं और जोर देकर कहता हूं कि सरकार का मुख्य दायित्व यह है कि वह गरीबी की समस्या का सामना करे। सरकार