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बजट पर चर्चा

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दो करोड़ है। बहस करने के लिए मान लीजिए, मैं अपने मन के विरुद्ध यह बात मान रहा हूं, कि यह सरकार बहुत उदार है और कुल भू-राजस्व, यानी साढ़े तीन करोड़ रुपए को छोड़ सकती है, पर यदि हम इस राशि को प्रेसिडेंसी की जनता में बांट देते हैं, तो मेरे हिसाब से मोटे तौर पर प्रति व्यक्ति की आय में, आज की परिस्थिति में लगभग डेढ़ रुपए की वृद्धि होती है। यह सर्वोच्च आय है। इसे मासिक भत्ते के रूप में तब्दील करने पर प्रति व्यक्ति की आय में प्रति मास ढाई आने की वृद्धि होगी। अब मैं पूछना चाहता हूं कि क्या वास्तव में कोई इस बात को स्वीकार करेगा कि सारा भू-राजस्व माफ कर देने के परिणामस्वरूप ढाई आने की वृद्धि हो जाने से हमारी आर्थिक स्थिति इस तरह सुधर जाएगी कि हमारे सम्मुख जो गरीबी की समस्या है, वह समाप्त हो जाएगी। महोदय! इस बीमारी का इलाज कुछ और ही है। मैं इस समय इस पर बात नहीं करना चाहता। मैंने शायद सदन को काफी उकता दिया है। लेकिन मैं यह अवश्य कहना चाहता हूं कि यह ऐसी समस्या है, जिससे सरकार परिचित नहीं है। मैं यह भी कहना चाहता हूं कि जो सरकार इस समस्या से परिचित नहीं है, जिस सरकार के पास इस विकट समस्या को हल करने के लिए उपाय नहीं है, वह जनता को कोई राहत नहीं पहुंचा सकती, वह प्रेसिडेंसी की जनता को खुशी नहीं दे सकती। इसलिए मैं निष्कर्ष रूप में यह कहना चाहता हूं कि यह सबसे निराशाजनक बजट है। यह बजट अमीरों को राहत देने और लोगों को भूखा रखने के लिए बनाया गया है (तालियां)।

IV *

डॉ. भीमराव अम्बेडकर (बंबई नगर) : अध्यक्ष महोदय! अब यह माननीय वित्त मंत्री का तीसरा बजट है, जिसे उन्होंने सदन में प्रस्तुत किया है। मैं समझता हूं कि यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि उन्होंने इस सदन में पहले, जो दो बजट प्रस्तुत किए थे, वे संतोषप्रद नहीं थे। शायद पहले दो असंतोषप्रद बजटों के संबंध में बहाने भी दिए गए थे। उन्होंने जो पहला बजट प्रस्तुत किया था, वह वास्तव में उनका अपना बजट नहीं था। उसे शायद अंतरिम सरकार ने तैयार किया था। इसलिए पहले बजट में जो कमियां थीं, उसके लिए निस्संदेह वित्त मंत्री को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। दूसरे बजट के बारे में बहाना यह था कि उसे जल्दबाजी में तैयार किया गया था, क्योंकि सरकार के पास सारी वित्त-व्यवस्था को समझने और अपनी योजनाएं तैयार करने के लिए पर्याप्त समय नहीं था। मुझे विश्वास है कि वर्तमान बजट के साथ ऐसा कोई बहाना नहीं है, जिसे उन्होंने हमारे सामने प्रस्तुत किया है। इस बजट के बारे में कहा जा सकता है कि इसे भली-भांति सोच-समझकर तैयार

* बोंबे लेजिस्लेटिव असेम्बली डिबेट्स, खंड 5, भाग 1, पृ. 903-16, 21 फरवरी 1939