24 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
किया गया है। निस्संदेह इसमें पूरी योजना दी गई है कि सरकार को कराधान के मामले में क्या करना है और किस मद पर कैसे खर्च करना है। उन्होंने वही मदें ली हैं, जिन पर उनकी दृष्टि से तात्कालिक खर्च करना चाहिए। इसलिए मैं समझता हूं कि इस बजट को अधिक ध्यान से देखा-परखा जाना चाहिए।
हर कोई जानता है कि यह ऐसा बजट है, जिसने सबके मन में उत्तेजना पैदा कर दी है। जो लोग बजट से कुछ अपेक्षा रखते थे, वे निराश हो गए हैं, और जिन पर इसका प्रहार हुआ है, उन्होंने इसे उथल-पुथल वाला बजट कहा है। मैं जब इसके राजस्व और व्यय पक्ष को देखता हूं, तो मेरा भी यह विचार बनता है कि राजस्व की दृष्टि से इसे अविवेचित और व्यय की दृष्टि से अर्थहीन बजट कहना ठीक होगा। निस्संदेह, इस बजट के एक भाग के रूप में वित्त विधेयक में विहित प्रस्तावों के गुण और दोषों की विवेचना करने के लिए उपयुक्त अवसर नहीं है। उन प्रस्तावों की विस्तृत आलोचना तभी की जाएगी, जब वित्त विधेयक को इस सदन में विचारार्थ प्रस्तुत किया जाएगा। फिर भी, सामान्यतः यह कहना अनुचित न होगा कि कराधान के प्रस्तावों पर मैं क्या सोचता हूं, जिन्हें मंत्री महोदय ने वित्त विधेयक में शामिल किया है।
वित्त विधेयक में छह अलग-अलग प्रस्ताव हैं। सबसे पहले तो इस विधेयक में यह है कि स्टाम्प ड्यूटी और कोर्ट फीस में जो वृद्धि की गई और जिसे 1932 के बंबई वित्त अधिनियम 2 के अनुसार स्वीकृति मिली थी, उसे एक साल और जारी रखने का प्रस्ताव है। दूसरे, इसमें बिजली के उपभोग का शुल्क बढ़ा दिया गया है। तीसरे, इसमें अचल सम्पत्ति के हस्तांतरण-पत्रों पर कुछ शहरों और शहरी क्षेत्रों में स्टाम्प ड्यूटी बढ़ा दी गई है। चौथे, अचल संपत्ति के पट्टे पर कर लगा दिया गया है। पांचवे, बंबई उप नगर जिला और अहमदाबाद शहर में भवनों के वार्षिक किराया मूल्य में 10 प्रतिशत की वृद्धि कर दी गई है। छठे, इसमें इन तीन मदों — मोटर स्प्रिट या चिकनाई युक्त पदार्थ, निर्मित कपड़ा, रेशमी धागे पर बिक्री कर लगाया गया है, जो सवा छह प्रतिशत से अधिक न हो। जैसा कि मैंने पहले कहा था, कराधान के इन प्रस्तावों के विवरणों की तह में जाने का मेरा इरादा नहीं है। मैं संक्षेप में सामान्य सिद्धांतों पर कुछ आलोचना करूंगा।
अब मैं स्टाम्प ड्यूटी और कोर्ट फीस को जारी रखने वाले मुद्दे को उठाता हूं। मैं माननीय वित्त मंत्री को यह याद दिलाना चाहता हूं कि जहां तक मुझे याद है यह कर वही है, जिस पर पुरानी विधान परिषद में कांग्रेसियों ने हमेशा आपत्ति की थी। महोदय! मुझे एक भी ऐसा बजट अधिवेशन याद नहीं है, जब कांग्रेसियों ने बजट अधिवेशन को वार्षिक अखाड़ा न बना दिया हो, जिसमें एक ओर वित्त सदस्य और दूसरी ओर कांग्रेसी होते थे। तब हर साल करों का पूरी ताकत से विरोध होता था और कांग्रेसी
खुद इस कर को लगातार बनाए रखना नहीं चाहते थे। अब स्थिति इतनी बदल गई है कि कांग्रेसी मंत्री ही स्वयं इस कर को हमेशा के लिए बनाए रखना चाहते हैं। संक्षेप