1. बजट पर चर्चा - Page 44

बजट पर चर्चा

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पर भी लागू होती है। मैं समझता हूं कि यह आपत्ति गंभीर आपत्तियों में से एक है।

दूसरे, यह संपत्ति जिस पर सरकारी प्रस्ताव के अंतर्गत कर लगाया जाता है, वह ऐसी संपत्ति नहीं कही जा सकती कि उस पर इस समय कर नहीं लगा हुआ है और यह भी नहीं कहा जा सकता कि उस पर मामूली कर लगा हुआ है, इसलिए इस पर ऊंचा कर लगाया जा सकता है। मुझे बंबई नगर की बात करने की अनुमति दें।

माननीय अध्यक्ष : मुझे डर है कि एक भ्रांति हो गई है। पूना इस कराधान प्रस्ताव में शामिल नहीं है।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : मुझे अफसोस है। केवल बंबई और अहमदाबाद को शामिल किया गया है। बंबई की स्थिति को ही लें। वह यह है कि बंबई नगर पालिका संपत्ति के कर योग्य मूल्य पर कुल मिलाकर साढ़े अठारह प्रतिशत कर लगाती है, जो उसके अपने उपयोग के लिए है। इसके अतिरिक्त अगर संपत्ति पट्टे पर है, तो मकान मालिक को भूमि का किराया भी देना पड़ता है। इसके अतिरिक्त, उसे भारत सरकार को आयकर भी देना होता है, जो उसे संपत्ति के किराए से होती है। इन सबको एक साथ जोड़ कर देखें, तो मेरा ख्याल है, यह कुल मिलाकर 22-23 प्रतिशत हो जाएगा (एक माननीय सदस्य : 50 प्रतिशत)। तो ठीक ही मेरे माननीय मित्र कहते हैं कि यह 50 प्रतिशत बैठेगा। वह शायद इसे आगे चलकर स्पष्ट करेंगे। मैं जो कहना चाहता हूं, वह यही है कि यह नहीं कह सकते कि इस संपत्ति पर मामूली कर लगाया गया है। इस पर तो पहले ही भारी कर लगाया गया है। इसलिए दस प्रतिशत कर का और भार डाल देना अनुचित है।

मैं अगली बात माननीय वित्त मंत्री से यह कहना चाहता हूं कि वह शायद समझ रहे हैं कि यह सिर्फ रेट है, कर नहीं है। इस बात पर मेरा उनके साथ विवाद है। वह जो लगा रहे हैं, रेट नहीं है, कर है। रेट और कर में अंतर इस प्रकार है। रेट वह है, जिसके लिए विशेष सेवा मिलती है। हम नगरपालिका को रेट देते हैं और उसके बदले में हमें नगरपालिका से सीधी सेवा मिलती है, जैसे पानी मिलता है, सफाई-व्यवस्था मिलती है, बिजली मिलती है और अन्य विभिन्न सेवाएं मिलती हैं। यह वास्तव में दी गई सेवा के दाम हैं, लेकिन जो कुछ वित्त मंत्री महोदय कर रहे हैं, वह सेवा नहीं है, इसलिए यह कर है। मंत्री महोदय इसे संपत्ति पर कर की संज्ञा दे रहे हैं, परंतु मैं इसे आयकर कहता हूं। मैं उन्हें यह बता देना चाहता हूं कि चीजें कुछ नहीं देतीं, आखिर व्यक्ति ही देता है। अगर व्यक्ति कुछ भुगतान करता है, तो वह उसे अपनी आय में से ही देता है। इसलिए यह आयकर है। अब मैं मंत्री महोदय से यह पूछना चाहता हूं कि न्यायसंगत सिद्धांत जो आयकर की सामान्य योजना का अंग माना जाता है, उसे इस कर का अंग क्यों नहीं बनाया? इस सिलसिले में दो बातें कही जा सकती हैं। एक बात तो यह कही जा सकती है कि आयकर की हर योजना में छूट की व्यवस्था होती है। एक निश्चित न्यूनतम सीमा है, उसके नीचे आप आयकर नहीं लगा सकते।