28 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
मेरा ख्याल है, इस समय आयकर की न्यूनतम सीमा लगभग 2,000 रुपए है। अगर यह आयकर है और मैं जोर देकर कहता हूं कि यह आयकर है और कुछ नहीं है, तो फिर इसमें छूट क्यों नहीं दी गई? सभी मकान मालिकों को एक ही वर्ग में रख देने से कोई फायदा नहीं है। मैं हिन्दू कालोनी में रहता हूं। वहां ऐसे बहुत से लोग हैं, जिन्हें सरकार से ग्रेच्यूटी मिली है। बहुत से लोगों को भविष्य निधि की कुछ जमा राशि मिली है। इन लोगों ने छोटे-छोटे मकान बना लिए हैं। मकान के एक हिस्से में वे स्वयं रहते हैं और शेष भाग में किराएदार रखते हैं। ये लोग जमीन का किराया देते हैं। ये नगरपालिका को कर देते हैं। क्या उन लोगों का कोई ध्यान नहीं रखना है? फिर ऐसे भी लोग हैं, जिन्होंने लाखों रुपए भवनों में लगा दिए हैं। वे कुछ नहीं करते हैं, बस इस संपत्ति की आय पर रहते हैं। मैं कहता हूं कि इन दोनों प्रकार के मकान-मालिकों में अंतर है और अंतर करना ही चाहिए। प्रश्न यह है कि यहां यह अंतर क्यों नहीं किया गया?
एक और पहलू पर विचार करें। बहुत सी संपत्तियां ऐसी भी हैं, जो परोपकारी संगठनों की हैं। मैं यह नहीं जानता कि ऐसी संपत्ति कितनी है, परंतु अत्यधिक है। उदाहरण के लिए बंबई को ही लें। यहां सोशल सर्विस लीग, सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसायटी और अन्य बहुत से संगठन हैं, जिनका उल्लेख किया जा सकता है। वे अपनी आय में से गरीबों, विधवाओं, अनाथ बच्चों, अशिक्षितों की सहायता करते हैं और उन्हें चिकित्सा सुविधाएं भी देते हैं। मैं नहीं समझ सकता कि इस जैसी सरकार, जिसने समाज सेवाओं के प्रति अपने दायित्व को त्याग दिया है (मैं इसे आगे चलकर बताऊंगा) और ऐसी सेवाएं प्रदान करने का बोझ जनता को मिलने वाले दान पर डाल दिया है, परोपकारी संस्थाओं के लिए करों में छूट क्यों नहीं देती है? आयकर अधिनियम की धारा 4 में भी व्यवस्था है कि परोपकार के नाम पर जो आय होती है, उस पर कर नहीं लगेगा। मेरी समझ में नहीं आता कि इनमें से कोई भी बात माननीय वित्त मंत्री के ध्यान में क्यों नहीं आई? मुझे विश्वास है कि जब हम विधेयक पर बात करेंगे, तो मंत्री महोदय कुछ कहेंगे।
अब बिक्री कर की बात करें। निजी तौर पर मैं इसे पसंद नहीं करता। मैं जानता हूं कि ऐसे लोग भी हैं, जो समझते हैं कि यह कर अच्छा है और इसे लगाना चाहिए। मेरी राय उनसे अलग है। यह कर मुझे ऐसा ही लगता है, जो भारतीय मिलों पर 1894 से लगाया गया था, जिसे कपड़ा उत्पादन पर उत्पाद शुल्क कहा जाता है। यह उसके सिवाए और कुछ हो भी नहीं सकता। अगर इसे निर्माता या विक्रेता द्वारा स्थानांतरित कर दिया जाए, तो अवश्य ही इसका प्रभाव उपभोक्ता पर पड़ेगा। अवश्य ही, इससे उसके जीवन स्तर पर प्रभाव पड़ेगा। अगर इसे स्थानांतरित नहीं किया जाता है और इसे निर्माता ही स्वयं सहन करते हैं, तो इसका प्रभाव उद्योग पर पड़ेगा। किसी भी स्थिति में यह कराधान बहुत संतोषप्रद नहीं है।
महोदय! मैं उनमें से हूं, जो यह मानते हैं कि जीवन की अच्छी चीजें छप्पर फाड़कर