32 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
गैलन और 1910 और 1914 में 22.43 गैलन थी। अवश्य ही, हमारी स्थिति की किसी भी हालत में अमरीका की स्थिति से तुलना नहीं की जा सकती।
एक और संकेत लीजिए। क्या हम कह सकते हैं कि देश में शराब जैसी कोई चीज है? क्या हम कह सकते हैं कि हमारे यहां ऐसे लोग रहे हैं, जिनकी मौत केवल शराब पीते रहने से हुई है? क्या ऐसे लोग हुए हैं, जो अत्यधिक शराब पीने से जिगर की बीमारी से पीडि़त होकर मरे हैं? मैंने इस प्रांत की पब्लिक हैल्थ रिपोर्टों में प्रकाशित आंकड़ों का अध्ययन किया है। मैंने भारत सरकार द्वारा नियुक्त स्वास्थ्य आयुक्त द्वारा प्रकाशित आंकड़ों की खोजबीन की है। मैं यह कहना चाहता हूं कि दोनों ने शराबखोरी से होने वाली मौतों का उल्लेख करना भी आवश्यक नहीं समझा। उन्होंने ऐसा इसलिए नहीं किया क्योंकि ऐसी मौतें हमारे देश में नहीं होतीं। दूसरी ओर, देखिए, अमरीका में क्या हुआ। अमरीका में शराबखोरी के कारण मरने वालों की स्थिति इस प्रकार है — 1917 में प्रति 1,000 लोगों में से 5, 1916 में 5.8, 1915 में 5.2, 1914 में 4.9, 1913 में 5.10 लोग शराबखोरी से मरे। एक और संकेत देखें। कितने लोग शराब की लत के कारण जिगर की बीमारी से मरे। इनकी संख्या प्रति 1,000 व्यक्ति इस प्रकार थी : 1917 में 11, 1916 में 12, 1915 में 12.6, 1914 में 13, 1913 में 13.4 लोग। मेरा निवेदन है कि हमारे देश में इस प्रकार की घटनाएं नहीं हैं। इसलिए मेरा विचार है कि मंत्रालय का यह कथन गलत है कि हमें इस समस्या से निबटना होगा। मैं मानता हूं कि हमारे देश में ऐसी समस्या कभी बन भी नहीं सकती। इसके दो सशक्त कारण हैं। एक, भारत के सभी धर्म मद्यपान को पाप समझते हैं और उस पर रोक लगाते हैं। धर्म ने बहुत से शरारती काम किए होंगे, परंतु इसमें कोई शक नहीं है कि भारतीय धर्मों, हिन्दू, मुस्लिम, पारसी ने एक अच्छा काम किया है। वह है, शराब पीने पर प्रतिबंध लगाना, जिसका पालन हमारी अधिसंख्य जनता ने बहुत सख्ती से किया है।
हमारी दूसरी विशेषता जो हमारे देश को अन्य देशों से बिल्कुल अलग करती है और जिसके कारण मद्यपान की कोई समस्या खड़ी ही नहीं हो सकती है, वह यह है कि शराब का व्यापार सरकार के हाथ में है। यह निजी मुनाफाखोरों के हाथों में नहीं है, जैसा कि अमरीका में या यूरोप के अन्य देशों में है। सरकार एक जिम्मेदार संस्था है। वह जनमत के अधीन होती है। वह इस सदन की राय के अधीन है, इसलिए वह कभी खराब काम नहीं कर सकती, जबकि यह काम निजी मुनाफाखोर कर सकते हैं। जैसा कि मैंने कहा है, हर दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर मैं यह मानने के लिए तैयार नहीं हूं कि यह ऐसी समस्या है, जिससे निबटने की आवश्यकता है।
महोदय! मेरा अगला प्रश्न है, क्या यह अत्यंत आवश्यक समस्या है कि हम हर चीज को ताक पर रख दें और पहले इससे निबटें? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए यह बात ध्यान में रखना आवश्यक है कि इस प्रेसिडेंसी के लोगों की विभिन्न आवश्यकताएं क्या हैं? क्या उनकी अन्य आवश्यकताएं पूरी हो गई हैं? क्या वे उनसे