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वित्त अधिनियम - संशोधन विधेयक

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कर में पूर्ण हक है, सबसे बाद में आती है। महोदय! बंबई नगरपालिका के लिए जिसे तेरह लाख नागरिकों के कल्याण का दायित्व निभाना है, ऐसी व्यवस्था कहां तक वांछनीय है? क्या ऐसे विधेयक को पास करना सही होगा, जो नगरपालिका के हित और दावे को सबसे अंत में रखता है?

मेरे माननीय मित्र इस संपत्ति कर को लागू करने के लिए जिम्मेदार हैं। जैसा कि उन्होंने स्वयं ही अपनी आरंभिक टिप्पणी में कहा था, इस कदम का जनता द्वारा विरोध किया जा रहा है।

माननीय श्री ए.बी. लाट्ठे : मैंने कहा था कि सरकार का एक वर्ग . . .

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : मेरे लिए इतना ही काफी है (ठहाका)। उन्होंने कहा था कि इस कदम का विरोध हो रहा है। अगर इस कदम का विरोध है, तो यह विरोध किस रूप में है? हमें यह समझना चाहिए। मैं नहीं समझता कि मैं कोई झूठा वक्तव्य दे रहा हूं, या ऐसी कोई बात कह रहा हूं जो कि माननीय राजस्व मंत्री की जानकारी में नहीं है। और वह वक्तव्य है, विपक्ष के नेता मेरे माननीय मित्र भी मेरी बात की पुष्टि करेंगे कि जमींदारों का एक छोटा वर्ग और समूची मुसलमान बिरादरी इस विधेयक का विरोध कर रही है। इस बात में तनिक भी अतिशयोक्ति नहीं है। गलत है या सही है, वे विरोध कर रहे हैं। इस समय मैं इसकी जांच करना नहीं चाहता। लिहाजा यह सिर्फ किसी एक अडि़यल व्यक्ति का मामला नहीं है, जो कर की अदायगी करने के लिए तैयार नहीं, बल्कि पूरी एक बिरादरी इसका विरोध कर रही है। अब, महोदय, इस पर गौर फरमाया जाए कि इस विधेयक का क्या नतीजा होने वाला है। स्थिति कुछ ऐसी है : नगरपालिका को कहा गया है कि वह अपने द्वारा लगाए गए संपत्ति कर और बंबई सरकार द्वारा लगाए गए कर, दोनों की वसूली करे। मेरे माननीय मित्र मुझसे सहमत नहीं होंगे, यदि मैं कहूं कि वह एक डाकू की तरह उस धन पर झपटने को तत्पर हैं, जो नगरपालिका ने इकट्ठा किया है और वह भी इस बात का ध्यान किए बिना कि यह धन नगरपालिका द्वारा उनके लिए इकट्ठा किया गया है, या स्वयं अपने ही लिए। जैसे ही वह देखते हैं कि नगरपालिका की बैंक में जमा राशि बढ़ गई है, वह बैंक को वारंट जारी कर देते हैं। इस क्रम में वह यह भी नहीं देखते कि नगरपालिका की देनदारी कितनी है। नगरपालिका असहाय रह गई है। प्रश्न यह है कि अब नगरपालिका क्या करे? विधेयक की योजना के अनुसार, नगरपालिका को पूरे समाज के खिलाफ अपना काम आगे चलाना है और कर वसूल करना है। अब मैं अपने माननीय मित्र के सामने जो मुद्दा रखना चाहता हूं वह यह है कि अगर उनमें हिम्मत है, तो वह स्वयं कर ही उगाही करें। भला नगरपालिका कर की उगाही कैसे कर सकती है, जबकि उसके खिलाफ संगठित विरोध खड़ा हो गया है? हमें इस बात को भी जान लेना चाहिए कि यह विरोध मुसलमानों की ओर से हो रहा है, जहां परदा प्रथा है। उनके मकानों में घुसकर यह मालूम करने की हिम्मत कौन