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शिक्षा के लिए अनुदान *
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : अध्यक्ष महोदय! मैं अधिक समय नहीं लेना चाहता, क्योंकि मैं यह समझता हूं कि हमारे पास समय बहुत कम है। फिर भी, मैं माननीय शिक्षा मंत्री के विचारार्थ कुछ मुद्दे प्रस्तुत करना चाहता हूं।
सबसे पहला मुद्दा, जो मैं उनके ध्यान में लाना चाहता हूं, वह यह है कि अपने बच्चों की शिक्षा के मामले में हमारी प्रगति बहुत धीमी है। भारत सरकार ने हाल ही में शिक्षा की प्रगति के बारे में जो रिपोर्ट जारी की है, उसे पढ़कर बहुत दुःख होता है। उसमें कहा गया है कि अगर शिक्षा की प्रगति इसी वेग से चलती रही, जो आज चल रही है, तो स्कूल जाने वाली उम्र के लड़कों को 40 साल और लड़कियों को 300 साल शिक्षित बनाने में लगेंगे। महोदय! मैं कहना चाहता हूं कि यह बहुत निराशाजनक स्थिति है, जिस पर इस सदन को विचार करना है। माननीय वित्त मंत्री ने बजट प्रस्तुत करते हुए हमें बताया था कि 1921-22 से लेकर आज तक शिक्षा पर खर्च लगभग 39 लाख रुपए बढ़ गया है। महोदय! शिक्षा के खर्च और स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या में हुई बढ़ोतरी को ध्यान में रखने पर मुझे लगता है कि स्कूली बच्चों की संख्या में बढ़ोतरी, शिक्षा पर खर्च में हुई बढ़ोतरी के अनुरूप नहीं है। अगर हम 1916-17 से 1922-23 के आंकड़ों को देखें, तो हम पाएंगे कि शिक्षा पर खर्च लगभग सौ गुना बढ़ गया है, जबकि उसी अवधि के दौरान स्कूली बच्चों की संख्या में बढ़ोतरी केवल 29 प्रतिशत हुई है। महोदय! मैं जानता हूं कि बंबई प्रेसिडेंसी में वित्तीय संकट है और हम इस समय ऐसी स्थिति में नहीं हैं कि शिक्षा में तेजी से प्रगति करने की मांग करें, लेकिन हम एक मांग तो कर ही सकते हैं। हमारे पास इस प्रेसिडेंसी में दो विभाग हैं, जो मेरे अनुसार एक-दूसरे से उल्टा काम कर रहे हैं। हमारे पास शिक्षा विभाग है, जिसका काम लोगों को नैतिकता सिखाना और उनको समाज में रहने लायक बनाना है। दूसरी ओर हमारे पास उत्पाद शुल्क विभाग है, जो मेरे विचार से एकदम विपरीत दिशा में काम कर रहा है। महोदय! मेरे विचार से मेरी मांग बड़ी नहीं है, अगर मैं कहूं कि हम शिक्षा पर कम से कम उतनी राशि तो
* बोंबे लेजिस्लेटिव काउंसिल डिबेट्स, खंड 19, पृ. 971-76, 12 मार्च 1927