शिक्षा के लिए अनुदान
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का समाज में स्थान और विकास एक समान नहीं है। अगर इन सबको एक स्तर पर लाना है, तो इसका एकमात्र समाधान असमानता के सिद्धांत को अपनाना और स्तर से नीचे वालों के प्रति अनुकूल बरताव करना है। मैं जानता हूं कि ऐसे लोग भी हैं, जो मेरी इस बात का विरोध करते हैं और समानता के सिद्धांत का समर्थन करते हैं। मैं यह कहना चाहता हूं कि सरकार ने मुसलमानों के संबंध में इस सिद्धांत को लागू करके अच्छा किया है। मैं ईमानदारी से विश्वास करता हूं कि ऐसे लोगों के साथ समान व्यवहार करना जो स्वयं असमान हैं, अगर सरल शब्दों में कहें, तो उनकी ओर उदासीन रहना और उनकी उपेक्षा करना है। मेरी एक ही शिकायत है कि सरकार ने अभी तक इस सिद्धांत को पिछड़ी जातियों के लिए लागू करने योग्य नहीं समझा है। आर्थिक या सामाजिक दृष्टि से पिछड़ी जातियां जिस तरह बाधित हैं, उस तरह कोई भी दूसरी जाति नहीं है। इसलिए मेरा ख्याल है कि उनके लिए सहानुभूतिपूर्ण रवैये का सिद्धांत अपनाया जाए। जैसा कि मैंने बताया है कि पिछड़ी जातियों की स्थिति मुसलमानों से बहुत खराब है और मेरा केवल यही निवेदन है कि सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार के वे सबसे अधिक हकदार हैं और उन्हें वास्तव में यह मिलना चाहिए, तो इस मामले में सरकार द्वारा मुसलमानों की अपेक्षा पिछड़ी जातियों की ओर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।
यही वह प्रश्न है, जिसे मैं मुख्य रूप से सदन के सामने प्रस्तुत करना चाहता हूं और माननीय शिक्षा मंत्री से आग्रह करना चाहता हूं कि वह यही पद्धतियां और सिद्धांत पिछड़ी जातियों के उत्थान के लिए अपनाएं, जो मुसलमानों के उत्थान के लिए अपनाए गए हैं। महोदय, मैं मंत्री महोदय का ध्यान 1882 के शिक्षा आयोग की रिपोर्ट पर 1885 में भारत सरकार द्वारा जारी किए गए निर्देशों की ओर आकर्षित करना चाहता हूं। रिपोर्ट में मुसलमानों के लिए शिक्षा में सुधार करने के लिए कई प्रस्ताव किए गए थे। भारत सरकार ने जिस प्रस्ताव पर जोर दिया था, वह यह था कि एक विशेष निरीक्षक वर्ग की नियुक्ति की जाए, जो मुसलमानों की शिक्षा की आवश्यकताओं को देखे और मुसलमानों को समझाए कि उनके लिए शिक्षा क्यों आवश्यक है। मैं समझता हूं कि दलित वर्गों की शिक्षा की देखभाल करने के लिए भी विशेष निरीक्षक वर्ग की उतनी ही आवश्यकता है। महोदय! मैं कहना चाहता हूं कि प्राथमिक शिक्षा अधिनियम बहुत गलत है। शायद माननीय सदस्य इस संबंध में मुझसे सहमत नहीं होंगे, लेकिन मैं कहता हूं कि वह गलत है। यह दोगुना गलत है। यह इसलिए गलत है, क्योंकि शिक्षा का दायित्व उनको दिया गया है, जिनको यह समझने का पर्याप्त ज्ञान नहीं है कि शिक्षा अत्यंत आवश्यक है। इस परिषद में ऐसे लोग नहीं हैं, जो शिक्षा की आवश्यकता को समझते हैं। स्थानी बोर्डों के सदस्य इतने अधिक अशिक्षित हैं कि वे नहीं समझते कि शिक्षा अत्यंत आवश्यक है। इसलिए मेरा कहना है कि इस परिषद ने शिक्षा का दायित्व उन लोगों को सौंपकर जो शिक्षा के प्रति उपेक्षा का भाव रखते हैं, बहुत गलत काम किया है। इतना ही नहीं, शिक्षा को स्थानीय बोर्डों को सौंपना