3. शिक्षा के लिए अनुदान - Page 65

48 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

गलत है, क्योंकि इससे उन कंधों पर बोझ डाल दिया गया है, जो उसे संभाल नहीं सकते। महोदय! हम सब समझते हैं कि जनता की शिक्षा पर बहुत खर्च होता है और अगर उस भारी खर्च को कोई संस्था उठाने में समर्थ है, तो यह परिषद ही है, जिसकी आय साढ़े पंद्रह करोड़ रुपए है। स्थानी निकाय जिनकी आय कुछ लाख रुपयों की ही है, इस योग्य नहीं हैं। महोदय! मैं महसूस करता हूं कि इस परिषद ने शिक्षा को स्थानीय निकायों को सौंपकर जनता में शिक्षा के प्रसार को वास्तव में अनिश्चित काल तक स्थगित कर दिया है और उसकी यह बहुत बड़ी गलती है। महोदय! मैं जो कुछ कहना चाहता हूं, यह तो उसकी प्रारंभिक तैयारी है, यथा इस गलती से सबसे ज्यादा हानि दलित वर्गों की हुई है। स्थानीय स्वायत्त शासन के माननीय मंत्री के प्रति पूर्ण आदर भाव रखते हुए मैं यह कहने के लिए विवश हूं कि उनके स्थानीय बोर्ड किसी संग्रहालय के संपत्ति गृहों के ढंग पर बने हैं, जहां प्रबंधक का उद्देश्य हर प्रकार के नमूने के लिए अपने संग्रहालय में जगह बनाना है। महोदय! हर स्थानीय निकाय में दलित वर्गों के लिए एक ही प्रतिनिधि का प्रबंध है। इन वर्गों का केवल एक ही प्रतिनिधि रखने की क्या उपयोगिता है? यह बात मेरी समझ में नहीं आती। उदाहरण के तौर पर, अगर स्थानीय बोर्ड में दलित वर्गों का प्रतिनिधि यह चाहे कि वह स्थानीय बोर्ड से ऐसी नीति पास करा ले, जो दलित वर्गों के हित में है, तो उसके प्रयत्न व्यर्थ ही रहेंगे। बात साफ है कि दस-बारह सदस्यों के निकाय में एक व्यक्ति का कोई महत्त्व नहीं है। मेरे पास प्रेसिडेंसी के सभी भागों से शिकायतें आती रहती हैं कि वर्तमान शासन के अंतर्गत दलित वर्ग अपने को अत्यंत दयनीय स्थिति में महसूस करते हैं। वे ऐसे लोगों से घिरे हुए हैं, जो उनकी महत्वाकांक्षाएं या उनकी विकास और प्रगति की इच्छाओं में किसी तरह भागीदार नहीं बन सकते। इसलिए मेरा कहना है कि इस बात की और भी अधिक आवश्यकता है कि सरकार किसी निरीक्षक एजेंसी को अपने सीधे नियंत्रण में नियुक्त करे, जो यह देखे कि वे निकाय जिनको शिक्षा जैसा महत्त्वपूर्ण काम सौंपा गया है, दलितों की उपेक्षा न करें।

दलितों के बारे में दूसरी बात मैं यह कहना चाहता हूं कि पिछड़ी जातियों को छात्रवृत्ति देने के लिए बजट में कुछ धन अलग रखा गया है। महोदय! बजट में प्रयुक्त ‘पिछड़ी जातियों’ शब्द का अर्थ मेरी समझ में नहीं आया है। यह बहुत ही अच्छा होता, अगर माननीय मंत्री द्वारा उन्हीं शब्दों का चयन किया जाता, जो पब्लिक इंस्ट्रक्शन के निदेशक ने अपनी रिपोर्ट में किया है। मैं यह भी चाहता हूं कि वह हर जाति के लिए जिन्हें वह ‘पिछड़ी जातियां’ शब्दावली में सम्मिलित करना चाहते हैं, अलग से निश्चित धन राशि नियत करें। तब हम यह जान पाएंगे कि मध्यवर्ती हिन्दुओं, पिछड़े हिन्दुओं और मुसलमानों की प्रगति साल-दर-साल कैसे हो रही है। आजकल हम सबको एक समान माना गया है, जबकि वास्तव में ऐसा मानने का कोई कारण नहीं