4. बंबई विश्वविद्यालय अधिनियम-संशोधन विधेयक - Page 67

50 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

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बंबई विश्वविद्यालय अधिनियम-
संशोधन विधेयक *

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : अध्यक्ष महोदय! मैंने अपने माननीय मित्र, बंबई विश्वविद्यालय के सदस्य का भाषण बहुत रुचि के साथ सुना है। उन्होंने अपने एक घंटा बीस मिनट के भाषण में विषय पर इतना विस्तारपूर्वक खुलासा किया है कि मुझे लगता है कि मेरे पास बोलने के लिए कुछ है ही नहीं, लेकिन मैं अपने को सौभाग्यशाली मानता हूं कि एक दृष्टिकोण है, जिसे न तो मेरे माननीय मित्र, विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि ने और न ही इस महत्त्वपूर्ण विधेयक पर जिस पर आज हम बहस कर रहे हैं, हमें सलाह-मशवरा देने के लिए विशेष रूप से आमंत्रित मेरे माननीय मित्र, प्रोफेसर हमील ने सदन के सामने रखा है। महोदय! मेरे माननीय मित्र श्री मुंशी ने अपने भाषण में अधिकांशतः बंबई विश्वविद्यालय के संगठन पर अपने विचार व्यक्त किए। वह अंतरंगता के साथ विधेयक में उल्लिखित सिंडिकेट, सीनेट और शैक्षिक परिषद के घनिष्ठ रिश्तों पर बोले। मुझे विश्वविद्यालय का सदस्य होने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ है। इसलिए मैं उसी अधिकार से यह नहीं कह सकता कि इस विधेयक में जो प्रावधान किए गए हैं, उनसे वही परिणाम निकलेंगे, जो हम चाहते हैं। लेकिन, महोदय! मैं अपने माननीय मित्र, विश्वविद्यालय के सदस्य के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए यह कहना चाहता हूं कि अगर हम विश्वविद्यालय की तीनों संस्थाओं के बीच वही संबंध कायम करने में सफल होते हैं, जैसा मेरे माननीय मित्र चाहते हैं, तो भी मुझे भय है कि अंत में हमें छाया ही मिलेगी, मूल तत्त्व नहीं। महोदय! अगर मैं माननीय शिक्षा मंत्री की बात को ठीक तरह समझ पाया हूं, तो इस विधेयक का मूल उद्देश्य बंबई विश्वविद्यालय को शिक्षा प्रदान करने वाले एक अच्छे विश्वविद्यालय के रूप में व्यवस्थित करना है। मैं समझता हूं कि यह इस विधेयक के मूल उद्देश्यों में से एक है। महोदय! अब जब कि मैं विधेयक में शामिल प्रावधानों का विश्लेषण कर रहा हूं, तो मुझे कहना पड़ेगा कि मैं महसूस करता हूं कि हमें इस मामले में निराशा ही मिलेगी। अपनी स्थापना के बाद

* बोंबे लेजिस्लेटिव काउंसिल डिबेट्स, खंड 20, पृ. 825-33, 27 जुलाई 1927