बंबई विश्वविद्यालय अधिनियम-संशोधन विधेयक
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से इस विश्वविद्यालय का सबसे बड़ा दोष यह रहा है कि इसका गठन परीक्षाएं लेने वाली संस्था के रूप में हुआ है।
महोदय! हमें इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि किसी भी विश्वविद्यालय को अनुसंधान कार्यों या उच्च शिक्षा को प्रोत्साहन देने में सफलता नहीं मिल सकेगी, अगर वह परीक्षा प्रणाली को ही अपने अस्तित्व का एकमात्र ध्येय मान लेता है। 1902 में गठित विश्वविद्यालय आयोग ने स्वीकार किया था और उसकी रिपोर्ट के बाद प्रस्तुत किए गए विधेयक में इस तथ्य को स्वीकार किया गया था कि जिस विधान से यह विश्वविद्यालय बना, उसे इस तरह बदलना चाहिए, जिससे विश्वविद्यालय विद्यार्थियों की परीक्षाएं तो लेता रहे, परंतु इसके साथ ही वह पढ़ाने का काम भी कर सके। महोदय! जब 1904 का वह विशेष अधिनियम लागू हुआ, तो उस समय पहले से चल रहे कुछ कॉलेजों के कारण विश्वविद्यालय के सामने उच्च शिक्षा देने के मार्ग में बाधा उत्पन्न हो गई। महोदय! इस स्थिति में विश्वविद्यालय ने एक ही काम किया था कि स्नातकोत्तर शिक्षा के कार्य को अपने अधिकार में ले लिया और 1912 से बंबई विश्वविद्यालय यही कर रहा है। इसलिए जिनको आज स्कूल ऑफ सोशियोलॉजी और स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स कहते हैं, उनकी स्थापना विशेष रूप से उन विद्यार्थियों के लिए की गई, जो उन विभागों में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं। महोदय! मैं समझता हूं कि यह विश्वविद्यालय 1904 के अधिनियम के अनुसार उसे सौंपे गए लक्ष्य को पूरा करने के लिए कुछ अन्य स्नातकोत्तर संकायों की स्थापना भी करना चाहता है। महोदय! उक्त विधेयक को तैयार करने वाले व्यक्तियों के प्रति यथोचित सम्मान व्यक्त करते हुए, मैं यही कहूंगा कि उन्होंने विश्वविद्यालय द्वारा शिक्षा प्रदान करने वाले एक विश्वविद्यालय के रूप में काम करने के लिए अपनाई गई इस विभाजन नीति के परिणामों पर ध्यान नहीं दिया। महोदय! मुझे लगता है कि मेरे माननीय मित्र प्रोफेसर हमील और श्री मुंशी मेरे कथन की पुष्टि करेंगे कि विश्वविद्यालय के कार्यों का विभाजन 1904 के अधिनियम के द्वारा किए गए इस विभाजन के परिणामस्वरूप विश्वविद्यालय ने स्नातकोत्तर की शिक्षा के कार्य को अपने अधिकार में ले लिया है और स्नातक शिक्षा का काम कॉलेजों के लिए छोड़ दिया है। इससे इन दोनों संस्थाओं के बीच एक प्रकार की प्रतिस्पर्धा की भावना पैदा हो गई, और मैं तो कहूंगा कि एक प्रकार की दुश्मनी हो गई है। हालांकि इस क्षेत्र में मेरा अनुभव सीमित है, फिर भी मैं एक कॉलेज में कुछ समय तक प्रोफेसर रहा था और यद्यपि अब मैं प्रोफेसर नहीं हूं, परंतु अपने पुराने सहयोगियों के साथ अब भी मिलता-जुलता हूं, जो मुझे बताते हैं कि विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों और कॉलेजों के प्रोफेसरों के बीच इतने मैत्रीपूण् ार् संबंध नहीं हैं, जितने कि होने चाहिएं। महोदय! ऐसा होना अवश्यंभावी है। जब विश्वविद्यालय और कॉलेज अपने-अपने ढंग से समान शिक्षा प्रदान करने का काम करते हैं, परंतु विश्वविद्यालय अन्य कॉलेजों की तुलना में अपने आपको अधिक ऊंचा