52 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
और श्रेष्ठ समझते हैं, तो एक-दूसरे के प्रति ईर्ष्याभाव अवश्य होगा। महोदय! मेरा यह निवेदन है कि जब कॉलेजों और विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों के बीच आपसी संबंध ही अच्छे नहीं हैं, तो अनुसंधान करने और ज्ञान प्राप्ति के लिए कैसे प्रोत्साहन मिलेगा और इससे कॉलेजों, विश्वविद्यालयों या अंततः जनता को कैसे लाभ मिलेगा।
महोदय! मेरा दूसरा निवेदन यह है कि जब तक विश्वविद्यालय पूर्व-स्नातक शिक्षा का काम अपने हाथ में नहीं लेता, तब तक स्नातकोत्तर शिक्षण का कितना ही भार उन पर डालने से कोई लाभ नहीं होगा। महोदय! विभिन्न कॉलेजों की स्थिति क्या है? मैं यह निवेदन करना चाहता हूं कि सरकारी कॉलेजों को छोड़कर अधिकांश कॉलेजों की स्थापना निजी प्रयत्नों से की गई है। मैं उन लोगों का निरादर नहीं कर रहा हूं, जो इनमें काम कर रहे हैं, जब मैं यह कहने की धृष्टता करता हूं कि वे कॉलेज पूर्व-स्नातक स्तर की शिक्षा संतोषजनक ढंग से नहीं दे पा रहे हैं। पहली बात तो यह है कि उनमें पर्याप्त स्टाफ नहीं है। उदाहरण के लिए दो विषय लें — इतिहास, राजनीतिक अर्थव्यवस्था — जो मेरे विशेष विषय थे। मैं जानता हूं कि एक कॉलेज में इन विषयों को पढ़ाने के लिए आमतौर पर दो प्रोफेसर होते हैं। यह मानना हास्यास्पद होगा कि एक कॉलेज में केवल दो प्रोफेसर इतिहास और राजनीतिक अर्थव्यवस्था जैसे इतने विशाल विषयों को ठीक से पढ़ा सकते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि प्रत्येक प्रोफेसर को एक सप्ताह में लगभग 13 घंटे व्याख्यान देना पड़ता है। मेरा
ख्याल है, मेरे माननीय मित्र प्रोफेसर हमील मेरी बात का समर्थन करेंगे। मेरा कहना है कि जिस प्रोफेसर को गुलाम जैसा काम करना पड़ता है, वह कभी भी सच्चे अर्थों में अध्यापक नहीं बन सकता। वह एक साधारण कर्मचारी ही बन सकता है और तैयार कुंजी की मदद से ही अपना काम करेगा। हम उससे मौलिकता की कोई उम्मीद नहीं रख सकते और वह उन विद्यार्थियों को जिनको दुर्भाग्यवश उससे पढ़ना पड़ रहा है, कोई प्रेरणा नहीं दे सकता। सारा शिक्षण मात्र एक यांत्रिक प्रक्रिया बनकर रह जाता है। यही नहीं कि कॉलेजों में प्रोफेसरों की कमी है, जो वहां हैं भी उनकी नियुक्ति इसलिए नहीं की गई थी कि वह कॉलेज को कुछ दे पाएंगे, बल्कि इसलिए कि वह कम वेतन पर काम करने को तैयार हैं। पूर्व-स्नातकों की बड़ी संख्या की सहायता से कोई भी साहसी व्यक्ति कॉलेज खोल सकता है और पूर्व-स्नातक शिक्षा का नियंत्रण अपने हाथ में ले सकता है। महोदय! मेरा कहना है कि अगर आपकी पूर्व-स्नातक शिक्षा प्रणाली इतनी ही खराब है, जितनी मैंने बयान की है, तो विश्वविद्यालय केवल स्नातकोत्तर शिक्षण के कार्य को अपने पर लादकर सच्चे ज्ञान को या अनुसंधान को प्रोत्साहन देने में सफल नहीं हो सकता। तीसरी बात यह है कि वर्तमान शिक्षा पद्धति पूर्णतः निरर्थक है। विश्वविद्यालय और कॉलेजों के बेहतर गठन से इसे सार्थक बनाया जा सकता है। उदाहरण के लिए बंबई शहर में ही राजनीतिक अर्थव्यवस्था की पढ़ाई को लें। महोदय! मेरी जानकारी है कि सिडनहेम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में लगभग छह