4. बंबई विश्वविद्यालय अधिनियम-संशोधन विधेयक - Page 70

बंबई विश्वविद्यालय अधिनियम-संशोधन विधेयक

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प्रोफेसर हैं, जो खासतौर पर इतिहास, राजनीतिक अर्थव्यवस्था और वाणिज्यिक भूगोल पढ़ाते हैं। इन्हीं विषयों को पढ़ाने के लिए विल्सन कॉलेज में, एल्फिंस्टन कॉलेज और सेंट जेवियर प्रत्येक में दो प्रोफेसर हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि बंबई जैसे शहर में इतिहास और राजनीतिक अर्थव्यवस्था पढ़ाने के लिए बारह प्रोफेसर हैं। महोदय! यदि इन चार कॉलेजों और उनके बारह प्रोफेसरों को लेकर ऐसी व्यवस्था की जाए, जिससे व्याख्यान पद्धति का समूहीकरण किया जा सके और कॉलेज में तथा विभिन्न कॉलेजों के विद्यार्थियों को किसी भी कॉलेज में व्याख्यान सुनने और उपस्थित रहने की अनुमति मिल सके, तो व्याख्यान देने वाले प्रोफेसरों को कुछ और विशेष काम के लिए आसानी से समय मिल सकेगा। अगर ऐसा होता है, तो मुझे पूर्ण विश्वास है कि विभिन्न कॉलेजों में समान विषयों को पढ़ाने वाले ये बारह प्रोफेसर पूर्व-स्नातकों को ही नहीं, बल्कि स्नातकोत्तर शिक्षा के कार्य को संभालने में समर्थ होंगे। इससे स्कूल ऑफ सोशियोलॉजी और स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स के विस्तार पर इस समय जो खर्च हो रहा है, उसमें अवश्य ही बचत होगी और उसका सदुपयोग दूसरे विषयों के लिए किया जा सकेगा। महोदय! ऐसा अपव्यय इतिहास और राजनीतिक अर्थव्यवस्था के स्नातकोत्तर शिक्षण के बारे में ही नहीं हो रहा है, बल्कि विश्वविद्यालय के अन्य विषयों के स्नातकोत्तर अनुसंधान शिक्षण में भी होगा। इसका सरल कारण यह है कि हमारे कॉलेज अपने आप में एक छोटे विश्वविद्यालय हैं। हर कॉलेज में लगभग हर विषय पढ़ाया जाता है और उनके स्टाफ में विश्वविद्यालय द्वारा परीक्षा के लिए निर्धारित सभी विषयों को पढ़ाने वाले प्रोफेसर हैं। इस स्थिति में अगर विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर शिक्षण के लिए अलग से प्रोफेसरों को रखता है, तो उससे पुनरावृत्ति और अपव्यय होगा। इसके अलावा और भी कई प्रकार की बाधाएं आएंगी, जिनका बयान मैं अपने भाषण में पहले ही कर चुका हूं। महोदय! इसलिए मेरा यह निवेदन है कि अगर इस विधेयक का उद्देश्य उच्च शिक्षा और अनुसंधान को प्रोत्साहन देना है, तो सबसे उत्तम उपाय यह है कि कॉलेजों को विश्वविद्यालय से अलग न किया जाए, जैसा अभी किया जा रहा है, बल्कि कुछ ऐसा संयोजन किया जाए, जिससे कि विश्वविद्यालय और कॉलेज समानता के आधार पर साझीदार हों और दोनों आपस में मिल-जुलकर पूर्व-स्नातक एवं स्नातकोत्तर शिक्षा को प्रोत्साहन देने में भागीदार बनें। महोदय! मेरे द्वारा व्यक्त किए गए विचार वास्तव में मेरे नहीं हैं। यह सिफारिशें सैडलर आयोग की थीं, जिसने कलकत्ता विश्वविद्यालय की इसी प्रकार की समस्याओं का विश्लेषण किया था। इसमें कोई शक नहीं है कि अब तक देश में जितने आयोग बने हैं, उनमें सैडलर आयोग सर्वाधिक कुशल आयोगों में से एक था। मेरी समझ में यह बात नहीं आती है कि यह सरकार उस रिपोर्ट पर कैसे गर्व कर सकती है, जिसे तैयार करने वाले सब अकुशल हैं और कैसे सैडलर आयोग के विशेषज्ञों के विस्तृत और सुविचारित निर्णय से मुकाबला कर सकती है। विश्वविद्यालय समिति ने बंबई विश्वविद्यालय के पुनर्गठन के संबंध में जो रिपोर्ट तैयार की है, वह मैंने बड़े ध्यान से पढ़ी है। इसमें मुझे ऐसा कुछ नहीं मिला, जिससे मैं अपना