4. बंबई विश्वविद्यालय अधिनियम-संशोधन विधेयक - Page 71

54 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

अभिप्राय * बदल दूं कि सैडलर आयोग की सिफारिशें बंबई विश्वविद्यालय समिति की सिफारिशों से ज्यादा प्रभावी और लाभदायक हैं। इसलिए मेरे विचार से यह बेहतर होगा अगर मेरे माननीय मित्र शिक्षा मंत्री अब भी किसी तरह इस विधेयक में ही व्यवस्था करके या सीनेट को नियम बनाने के अधिकार देकर विश्वविद्यालय को कॉलेजों पर नियंत्रण रखने की ज्यादा शक्ति देकर शिक्षण को स्थानीय बनाने दें और ऐसे कॉलेज जो भौगोलिक दृष्टि से एक जगह स्थित हों, वे संघटक कॉलेज कहे जाएं। मेरा विचार है कि समिति ने यह स्वीकार कर लिया है कि पूना एक अलग से विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए उपयुक्त स्थान है। इसमें कोई शक नहीं है कि बंबई स्वयं भी एक अलग से विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए सर्वथा उचित स्थान है। मेरा विचार है कि इन दोनों केन्द्रों में स्थित कॉलेजों को अलग करके विश्वविद्यालय में समाहित कर दिया जाए, तो हम शिक्षा और अनुसंधान की समस्या को हल कर सकेंगे। मुफस्सल क्षेत्र के कॉलेज जो प्रेसिडेंसी में इधर-उधर बिखरे हुए हैं उनका प्रबंध हम मुफस्सल बोर्ड बनाने के सैडलर कमेटी के सुझाव को अपनाकर कर सकते हैं। मैं यह कह सकता हूं कि सुधार समिति ने रेक्टर की नियुक्ति संबंधी जिस योजना की सिफारिश की है, उसकी अपेक्षा सैडलर कमीशन की योजना सौ गुना बढि़या है। महोदय, मुझे विश्वविद्यालय के गठन पर बस इतना ही कहना था।

अब मैं सीनेट के गठन से संबंधित मुद्दे को लेना चाहूंगा। कल मेरे माननीय मित्र श्री जाधव ने अपने भाषण के दौरान जब यह कहा कि लक्ष्यों का विवरण और तर्क बंबई विश्वविद्यालय की सीनेट में पिछड़े समुदायों के प्रतिनिधित्व की आवश्यकता का समर्थन नहीं करते हैं, तो बड़ी गर्मा-गर्मी हुई। मुझे इस बात पर कुछ अचरज हुआ कि मेरे माननीय मित्र, बंबई विश्वविद्यालय के सदस्य, इस पर फौरन उबल पड़े। परंतु महोदय! मैं यह कहना चाहता हूं कि हम हमेशा उस सीढ़ी को लात मारकर गिरा देते हैं, जिसके बल पर हम ऊपर चढ़ते हैं और मेरे माननीय मित्र बंबई विश्वविद्यालय के सदस्य, जिन्होंने प्रबलतापूर्वक सांप्रदायिकता का विरोध किया, वह स्वयं भी अपवाद नहीं हैं। महोदय! मैं उनको यह याद दिलाना चाहता हूं कि स्वयं उन्होंने इस आधार पर समर्थन प्राप्त करने के लिए कि गुजरात गुजरातियों के लिए है, विश्वविद्यालय के स्नातकों के नाम एक घोषणा-पत्र जारी किया था। अब मैं उनसे यह पूछना चाहता हूं कि . . .

श्री. के. एम. मुंशी : महोदय! मुझे यह कहते हुए प्रसन्नता हो रही है कि यह वक्तव्य बिल्कुल गलत है।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : यह पूर्णतया गलत नहीं है। मैंने आपका घोषणा-पत्र पढ़ा है। वैसे राजनीतिज्ञों की स्मरण-शक्ति कमजोर होती है।

मैं इस सदन में यह कहना चाहता हूं कि हिन्दू और मुसलमान जिस तरह उनके स्वभाव बन गए हैं, मैं नहीं समझता कि वे ईमानदारी से कह सकते हैं कि वे एक-दूसरे

* बंबई विश्वविद्यालय सुधार समिति को दिया गया डॉ. अम्बेडकर का लिखित साक्ष्य परिशिष्ट 3 के रूप में छपा है।