4. बंबई विश्वविद्यालय अधिनियम-संशोधन विधेयक - Page 72

बंबई विश्वविद्यालय अधिनियम-संशोधन विधेयक

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के प्रति असांप्रदायिक हैं। इस सदन का कोई सदस्य यह नहीं कह सकता कि वह अपने व्यवहार से असांप्रदायिक है। मैं चुनौती देता हूं, कोई माननीय सदस्य इससे इंकार करे कि . . .

राव बहादुर आर. आर. काले : मैं इस वक्तव्य को चुनौती देता हूं।

माननीय सदस्यगण : हम भी इस वक्तव्य को चुनौती देते हैं।

माननीय अध्यक्ष : शांति, शांति। कृपया एक-दूसरे से बात न करें।

राव बहादुर आर.आर. काले : लेकिन माननीय सदस्य, डॉ. अम्बेडकर ने कहा है कि वह किसी भी माननीय सदस्य को चुनौती देते हैं कि वह उनके वक्तव्य का

खंडन करके देखें।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : इस बात का खंडन नहीं किया जा सकता कि हर हिन्दू और हर मुसलमान एक खास जाति या समुदाय में पैदा होता है। इस तथ्य का भी विरोध नहीं किया जा सकता कि हम सबका पालन-पोषण सांप्रदायिक वातावरण में होता है। हमारे अंदर उसी समुदाय की इच्छाएं और महत्त्वाकांक्षाएं होती हैं और हम उस समाज की असमर्थता का अनुभव करते हैं। इस कारण मेरे मन में इस बारे में जरा भी संदेह नहीं है कि इस सदन का कोई भी सदस्य या सदन से बाहर का कोई भी व्यक्ति हर प्रश्न को चेतन या अचेतन अवस्था में सांप्रदायिक दृष्टि से देखने को विवश है।

माननीय सदस्यगण : नहीं, नहीं।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : मैं आपके नकारने का बिल्कुल विश्वास नहीं करता। महोदय! मेरे विचार से इस प्रकार चिल्ला-चिल्लाकर नकारना बिल्कुल पाखंड है। मैं ईमानदारी से स्वीकार करता हूं कि इसके सामने आने वाले हर सवाल पर मैं स्वयं सांप्रदायिक दृष्टि से विचार करता हूं और मैं अपने आप से पूछता हूं कि अमुक मामला दलित वर्गों के लिए ठीक रहेगा या नहीं।

श्री के. एम. नरीमनः मुझे इस बात पर अफसोस है।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : जो ‘अफसोस’ करते हैं, वे स्वयं सांप्रदायिकता से मुक्त नहीं हैं। गैर-सांप्रदायिकता पर बात करना बहुत आसान है, क्योंकि वह सिर्फ बात ही तो है। महोदय! हम जानते हैं कि जिस तरह से हमें देखा जाता है, हम दूसरे समुदायों के साथ समानता से मिल नहीं सकते। जब हमें अपनी बेटी की शादी करनी होती है, तब हम यह पूछते-फिरते हैं कि दूल्हा हमारी अपनी जाति का है या नहीं (ठहाका)। जब हम खाने के लिए मेहमानों को आमंत्रित करते हैं, तो यह जानने की कोशिश करते हैं कि वे हमारी जाति या हमारे समुदाय के हैं, या नहीं।

श्री आर. जी. पहलाजानी : मैं इसे चुनौती देता हूं।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : यह कहना केवल पाखंड है कि हम ऐसा नहीं करते। मैं चाहता हूं कि माननीय सदस्य यह समझ लें कि यह एक दोष है, जिसके लिए मैं किसी एक समुदाय को दोषी नहीं ठहराता। महोदय! यह एक कलंक है, जिससे हम