4. बंबई विश्वविद्यालय अधिनियम-संशोधन विधेयक - Page 73

56 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

सब पीडि़त हैं। ऐसी स्थिति में यह मान लेना चाहिए कि कोई भी समुदाय, चाहे वह बौद्धिक दृष्टि से कितना ही उन्नत क्यों न हो, दूसरे समुदाय का संरक्षक नहीं हो सकता। इस बात को तो उन विधायकों ने स्वीकार किया है, जिन्होंने सुधार अधिनियम बनाया था। अगर ऐसा नहीं होता, तो हम इस परिषद में मुसलमानों, पिछड़े वर्गों और दलित वर्गों के लिए अलग-अलग प्रतिनिधित्व नहीं देखते। यह इसलिए है कि हम स्वभावानुसार स्थिति को व्यापक रूप में देख नहीं सकते। सांप्रदायिकता की ताकत पर रोक लगाने के लिए यह प्रतिरोध लगाया गया है और मैं समझता हूं, इन विधायकों ने यह काम बड़ी समझदारी से किया है। महोदय! मैं अपनी बात ईमानदारी से कहूंगा और यह उम्मीद करता हूं कि मेरे माननीय सदस्य भी इस मुद्दे पर ईमानदार रहेंगे। इसमें कोई फायदा नहीं है कि हम कहें कुछ और करें कुछ और। मेरा निवेदन है कि इसी कारण बंबई विश्वविद्यालय की सीनेट में उन समुदायों के प्रतिनिधित्व की आवश्यकता है, जो बौद्धिक दृष्टि से उन्नत नहीं हैं। महोदय! मैं सीनेट पर जानबूझकर भेदभाव करने का आरोप बिल्कुल नहीं लगा रहा हूं। फिर भी, मैं इतना तो कहूंगा कि पिछड़े हुए या दलित वर्गों के प्रति बंबई विश्वविद्यालय का रवैया अब तक प्रोत्साहित करने वाला नहीं रहा है। मैं यहां बस एक उदाहरण देना चाहूंगा। उदाहरण के तौर पर इस विश्वविद्यालय की शिक्षा पद्धति को लें। मुझे इस बारे में कोई संदेह नहीं है और जो लोग विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि हैं, वे भी इससे इंकार नहीं करेंगे कि हमारी परीक्षा पद्धति भारत में प्रचलित वर्तमान परीक्षा पद्धतियों से कठिन है। निस्संदेह कुछ शिक्षा शास्त्री इसे उचित ठहराते हैं। उनका विश्वास है कि परीक्षा के स्तर को ऊंचा करना शिक्षा के स्तर को ऊंचा करने के समतुल्य है। मैं आदरपूर्वक उनसे असहमत हूं। परीक्षा, शिक्षा से बिल्कुल भिन्न है, परंतु शिक्षा के स्तर को ऊंचा उठाने के नाम पर वे परीक्षा के स्तर को इतना असंभव और कठोर बनाते जा रहे हैं कि जिन पिछड़ी हुई जातियों को अभी तक विश्वविद्यालय में प्रवेश करने का मौका नहीं मिला है, उनको बिल्कुल बाहर रखा जा रहा है। मैं इस पर बोलना नहीं चाहता, क्योंकि यह पद्धति सभी जातियों पर समान रूप से लागू होती है। फिर भी, महोदय! इस पर तनिक विचार तो करें। क्या विश्वविद्यालय ने इस पर कभी विचार किया है कि पिछड़ी जातियों की शिक्षा की प्रगति पर एक साथ ली गई परीक्षाओं का क्या प्रभाव पड़ता है? इसका औचित्य मेरी समझ में नहीं आता है कि एक उम्मीदवार जो परीक्षा में बैठता है, उससे यह अपेक्षा रखी जाए कि वह सब पेपरों में एक ही प्रयास में उत्तीर्ण हो जाए। यह मामला उन विद्यार्थियों के लिए कोई महत्त्व नहीं रखता, जिनके माता-पिता काफी समृद्ध हैं, जिनके पास समय है और दिन में कॉलेज जा सकते हैं तथा जो शिक्षा के लिए अपना सारा समय दे सकते हैं। सवाल यह है कि उन लड़कों का क्या होगा, जिनके गरीबी से त्रस्त माता-पिता को जरूरत है कि दो जून की रोटी का जुगाड़ करने के लिए वे दिन में कुछ काम करें? उन लड़कों का क्या होगा जो विश्वविद्यालय शिक्षा के लिए दिन