4. बंबई विश्वविद्यालय अधिनियम-संशोधन विधेयक - Page 74

बंबई विश्वविद्यालय अधिनियम-संशोधन विधेयक

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के बारह घंटों में से कुछ ही समय निकाल पाते हैं? अगर विश्वविद्यालय पिछड़ी हुई जातियों की आर्थिक स्थिति की परवाह करता, तो अवश्य ही वह एक साथ परीक्षाओं को लेने का आग्रह नहीं करता, जो मेरे हिसाब से बिल्कुल अनुचित और बेतुका है। मैं आपके सामने एक और उदाहरण पेश करता हूं, जो मेरे दिमाग में अभी-अभी आया है, क्योंकि मेरे माननीय मित्र, श्री मुंशी फरमाते हैं कि विश्वविद्यालय किसी के प्रति कोई पक्षपात किए बिना सब कुछ कर रहा है। विश्वविद्यालय सीनेट के लिए नामजद मेरे एक मित्र ने मुझसे एक दिन कहा था कि उन्होंने विश्वविद्यालय की परीक्षा में बैठने वाले दलित वर्ग के उम्मीदवारों की फीस में कुछ रियायत देने के संबंध में सीनेट में दो बार प्रस्ताव पेश किया था। मुझे उन्होंने यह भी बताया था कि सीनेट ने इस प्रस्ताव को दोनों बार रद्द कर दिया।

एक माननीय सदस्य : गरीब लोग तो सभी जातियों में हैं।

माननीय अध्यक्ष : माननीय सदस्य किसी रोक-टोक की परवाह किए बिना अपनी बात आगे जारी रखें।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर : यह बात सभी ने, यहां तक कि सरकार ने भी स्वीकार की है कि कुछ ऐसी जातियां हैं, जो आर्थिक दृष्टि से गरीब हैं और जिन्हें सरकार से विशेष रियायतों की आवश्यकता है, ताकि वे उसी स्तर पर आ जाएं, जहां दूसरी जातियां पहले से ही हैं। अगर इस विवेकपूर्ण सिद्धांत को सीनेट समझ नहीं सकती, उसकी कदर नहीं कर सकती, तो मुझे यह कहना पड़ेगा कि ऐसी सीनेट पिछड़ी हुई जातियों के हितों का संरक्षण कभी नहीं कर सकती।

मेरे माननीय मित्र, प्रोफेसर हमील ने अपने भाषण के दौरान कुछ टिप्पणी की थी और मेरे लिए यह जरूरी है कि मैं उनके बारे में बोलूं, हालांकि मैं सदन का ज्यादा समय नहीं लेना चाहता। उन्होंने कहा था कि दलित वर्गों और पिछड़े वर्गों को सीनेट में अवश्य ही नामजद किया जाए, बशर्ते कि वे विश्वविद्यालय की कुशलता को बढ़ा सकें। मेरा ख्याल है, उनका तर्क यह था कि अगर पिछड़ी हुई जातियों के लोग शिक्षा विशेषज्ञ हों, तो उन्हें अवश्य ही बंबई विश्वविद्यालय की सीनेट में सीटें दी जाएं। अब मैं यह कहना चाहूंगा कि मेरे माननीय मित्र प्रोफेसर हमील बयान करते समय यह बात बिल्कुल भूल गए कि इस सीनेट का सही काम क्या है। सीनेट विश्वविद्यालय की कार्यकारिणी नहीं है। पिछड़ी हुई जातियों के किसी भी सदस्य ने कभी सिंडिकेट या विद्या परिषद में विशेष प्रतिनिधित्व की मांग नहीं की है। मैं यह मानता हूं और जितना मेरे माननीय मित्र, प्रो. हमील समझते हैं उतनी ही अच्छी तरह समझता हूं कि विश्वविद्यालय की इन दोनों संस्थाओं का संचालन निस्संदेह विशेषज्ञ ही करते हैं और वही विश्वविद्यालय को चलाते हैं। परंतु मैं उन्हें यह याद दिलाना चाहता हूं कि सीनेट तो एक विधायी संस्था है, एक ऐसी संस्था है, जिसका काम पिछड़ी हुई जातियों की जरूरतों को पेश करना और साथ ही उनके लिए आवश्यक सुविधाओं