58 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
का सुझाव देना है। मेरे विचार से सीनेट बिल्कुल विधान परिषद की तरह है और इस परिषद में दलित वर्ग के जो सदस्य हैं, उनकी नियुक्ति उन माननीय सदस्यों को हटाने के लिए नहीं की गई है, जो सरकारी बेंचों पर बैठे हैं, बल्कि उनका एकमात्र काम सरकार को यह बताना है कि उन जातियों की क्या आवश्यकताएं हैं, जो अभावों से ग्रस्त हैं। हम सिर्फ यह मांग कर रहे हैं और मेरा विचार है कि मेरे माननीय मित्र तर्क करते समय यह बिल्कुल भूल जाते हैं कि सीनेट का क्या काम है।
महोदय! अब मैं अपनी बात खत्म करने से पहले एक बात बहुत जोर देकर कहना चाहता हूं। स्वराज पार्टी के मान्य सदस्यों की मांग है कि हमें प्रांतीय स्वायत्तता मिले। यह मांग स्वागत करने योग्य है। परंतु मैं यह कहना चाहता हूं कि जब तीन-चौथाई जनता अज्ञान के अंधेरे कुएं में पड़ी हो और अपने अधिकारों एवं दायित्वों से परिचित न हो, तो स्वायत्तता की कैसे आशा की जा सकती है। तीन-चौथाई जनता के अज्ञान के अंधेरे में भटकने पर भी, अगर स्वायत्तता मिल जाती है, तो हमारी प्रतिनिधित्व पद्ध ति एक ढोंग होगी और उस स्थिति में समृद्ध लोग गरीबों पर और शक्तिशाली लोग कमजोरों पर राज करेंगे। सचमुच यही होगा। महोदय! इसलिए मैं यह कहता हूं कि अगर हम प्रांतीय स्वायत्तता चाहते हैं, तो हमें दो बातें सुनिश्चित करनी पड़ेंगी। एक, जो जातियां शिक्षा की दृष्टि से पिछड़ी हुई हैं, उनके लिए हरेक तरह की आधुनिकतम शिक्षा प्राप्त करने के लिए सब मार्ग खुले हों, जिससे वे नागरिकता के अधिकारों एवं दायित्वों को समझ सकें। दूसरे, उन जातियों के लिए सारे मार्ग खुले रखने के लिए जिससे वह आधुनिकतम शिक्षा प्राप्त कर सकें, वर्तमान स्थितियों में यह आवश्यक बन जाता है कि उन्हें विशेष प्रतिनिधित्व दिया जाए।
महोदय! अपनी बात समाप्त करने से पूर्व मैं एक बात साफ करना चाहता हूं। कल आपने आदेश दिया था, जिसे मैं पूरी तरह समझ नहीं पाया हूं। आपके कल के निर्णय से मैं यह समझा हूं कि सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का सिद्धांत ठुकरा दिया गया है। अब उसके अनुसार मैं समझता हूं कि सामान्य शाब्दिक अर्थ की दृष्टि से खास समुदायों के मतदाताओं का संगठित होकर सदस्य को चुनने संबंधी सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत को ठुकरा दिया गया है। आपके निर्णय का मैं यह अर्थ निकाल रहा हूं। उसके अनुसार अब हमें विश्वविद्यालय की किसी भी समिति में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व पर प्रश्न पूछने नहीं दिए जाएंगे। परंतु मुझे नहीं लगता कि आपका निर्णय इतना विस्तृत है कि आप कह सकें कि जो 40 सीटें नामांकन के लिए आरक्षित रखी हैं, उनके आबंटन के संबंध में हम कोई राय नहीं दे सकते। मेरा निवेदन है कि माननीय सदस्यों के पास अभी भी इस विषय पर प्रवर समिति में या दूसरे वाचन के समय बहस करने का मौका है। मैं अपने माननीय मित्र शिक्षा मंत्री को कहना चाहता हूं कि इस संबंध में अपनी समापन टिप्पणी में अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करें, क्योंकि मैं जोर देकर कहना चाहता हूं कि जब तक सीनेट में पिछड़ी हुई जातियों को प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाएगा, यह विधेयक हमारे लिए कोई महत्त्व नहीं रखता और मैं इसके विरुद्ध मत दूंगा।