62 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
विश्वविद्यालय का बंबई विश्वविद्यालय के कॉलेजों के साथ संबंधों को नियमित करने के लिए प्रयोग में लाने चाहिए। किंतु इस आधार पर एतराज किए जा सकते हैं कि शायद विश्वविद्यालय अनुदान की सिफारिश के मामले में कोई अनुचित व्यवहार करे। मेरे विचार में इस धारणा के पीछे कोई औचित्य नहीं है कि विश्वविद्यालय का किसी विशेष कॉलेज के विरुद्ध निजी वैमनस्य होगा। मैं नहीं मानता कि नए अधिनियम के अंतर्गत विश्वविद्यालय में ऐसे गैर-जिम्मेदार व्यक्ति होंगे कि वे अपने स्वार्थों या सनक के लिए एक विशेष कॉलेज के हितों का बलिदान करेंगे। इसलिए मैं अनुरोध करता हूं कि इस आधार पर मेरा संशोधन स्वीकृत किया जाए।
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बहस पुनः आरंभ
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : महोदय! हालांकि मैं नहीं जानता हूं कि इस संशोधन का परिणाम क्या होगा? फिर भी मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि बहुत से माननीय सदस्यों ने इस संशोधन में विहित सिद्धांत को समझा है। मुझे यह उचित नहीं लगता है कि मैं इस संशोधन के विरुद्ध उठाई गई हरेक आपत्ति का जवाब देने के लिए सदन का समय बरबाद करूं। पर सबसे पहले मैं इस ओर ध्यान दिलाना चाहता हूं कि जो संशोधन मैंने प्रस्तुत किया है, जहां तक मेरा अनुमान है, वह अनुदान का वितरण करने के संबंध में विश्वविद्यालय को किसी भी ढंग से स्वेच्छाचारी नहीं बना सकता।
मैं केवल इतना कहना चाहता हूं कि अनुदान का वितरण विश्वविद्यालय द्वारा किया जाए। इससे अनुदान देने वाले मंत्री के अधिकारों में कोई कमी नहीं आएगी। वह इस संशोधन के बावजूद अनुदान के विषय में फैसला करने वाले अंतिम निर्णायक प्राधिकारी होंगे। मैं नहीं मानता कि माननीय शिक्षा मंत्री की अनुदान देने के मामले में विश्वविद्यालय जैसी एक महत्त्वपूर्ण संस्था के साथ विचार-विमर्श करने में आपत्ति होगी। मेरा विश्वास है कि वे सभी माननीय सदस्य, जो छोटे शहरों के कॉलेजों के पक्ष में होते हैं और जिन्हें डर है कि विश्वविद्यालय के अधिकारी छोटे शहरों के कॉलेजों के हितों के बारे में कोई हेराफेरी करेंगे, मेरे इस कथन से सहमत होंगे कि यह सिर्फ उनका कर्तव्य ही नहीं है, बल्कि इस सदन में प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य होगा कि वे देखें कि सरकार की वह राशि जो कि अनुदान के रूप में दी जा रही है, कॉलेजों द्व ारा सही ढंग से इस्तेमाल हो रही है। मेरे विचार में मंत्री महोदय को सलाह देने के लिए कि करों द्वारा एकत्र की गई और छोटे शहरों के कॉलेजों को अनुदान में दी गई राशि सही ढंग से प्रयोग में लाई जा रही है या नहीं, विश्वविद्यालय से ज्यादा योग्य संस्था और कोई नहीं हो सकती। मेरे विचार से मंत्री महोदय इस महत्त्वपूर्ण संस्था के विचारों से असहमत नहीं होंगे, जिसके कि वह इस विधेयक के पारित होने पर जनक कहलाएंगे।
* बोंबे लेजिस्लेटिव काउंसिल डिबेट्स, खंड 21, पृ. 264-65, 1 अक्तूबर 1927