बंबई विश्वविद्यालय अधिनियम-संशोधन विधेयक
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माननीय सदस्य श्री जयराम दास ने एक मुद्दा उठाया था, जिसका सत्ता पक्ष के सदस्यों द्वारा जोरदार स्वागत किया गया। उन्होंने कहा था कि इस संशोधन से सदन का मंत्री पर नियंत्रण कम हो जाएगा। मुझे नहीं मालूम मेरे संशोधन का यह नतीजा कैसे होगा? जैसा कि मैंने अभी कहा है कि मेरे संशोधन का उद्देश्य मंत्री के हाथ मजबूत करना है। अगर यह उद्देश्य स्पष्ट नहीं है, तो उसे सुस्पष्ट करने के लिए मंत्री महोदय जो भी संशोधन पेश करते हैं, मैं उसे मानने के लिए तैयार हूं। मेरी समझ में नहीं आता कि मेरा संशोधन इस सदन का मंत्री पर अधिकार या मंत्री के अधिकार को किस तरह कम करेगा। इस संशोधन के अंतर्गत भी मंत्री ही अनुदानों से संबंधित निर्णय लेने के लिए अंतिम प्राधिकारी होंगे। इस संशोधन का उद्देश्य सिर्फ यह है कि अनुदान देने के मामले में मध्यवर्ती संस्था होने के नाते विश्वविद्यालय से विचार-विमर्श किया जाना चाहिए। मैं नहीं मानता कि इससे मंत्री के अधिकार क्षेत्र पर या मंत्री पर सदन के नियंत्रण पर कोई भारी रोक होगी। बल्कि सदन यह निर्णय करने के लिए अच्छी स्थिति में होगा कि मंत्री द्वारा दी गई राशि सही ढंग से खर्च की गई है या नहीं। इन शब्दों के साथ मैं अपने संशोधन की सदन से सिफारिश करता हूं।
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डॉ. भीमराव अम्बेडकर : महोदय! मैं अपने माननीय मित्र श्री जाधव के संशोधन का समर्थन करता हूं। मुझसे पहले इस विषय पर माननीय सदस्यों द्वारा यह विचार व्यक्त किया गया है कि विश्वविद्यालय की वर्तमान वित्तीय स्थिति में यह नियुक्ति विश्वविद्यालय के सीमित साधनों पर एक अतिरिक्त बोझ होगी। मेरे विचार से यह तर्क अपने आपमें काफी प्रबल है और मैं इस संबंध में विशेष रूप से कहना चाहता हूं कि प्रशासनिक तौर पर यह नियुक्ति अनावश्यक है। महोदय! मुझे पता लगा है कि 1914 में बंबई विश्वविद्यालय ने मानचेस्टर विश्वविद्यालय के उप-कुलपति सर एल्फ्रेड हॉपकिन्सन को विश्वविद्यालय द्वारा अनुसंधान के बारे में प्रस्तावित एक योजना के विषय में विश्वविद्यालय को सलाह देने के लिए निमंत्रित किया गया था और, महोदय! मुझे पता लगा है कि इस संबंध में रिपोर्ट तैयार करने वाले अधिकारी के अनुसार यह नियुक्ति आवश्यक नहीं है। विश्वविद्यालय सुधार समिति की रिपोर्ट के पृष्ठ 9 पर उस अधिकारी के वक्तव्य का विवरण इस प्रकार है :
वह विश्वविद्यालय के एक वेतनभोगी प्रशासनिक अध्यक्ष के पक्ष में नहीं थे
और उन्होंने बढ़ते हुए कार्य से उपजी कठिनाइयों को हल करने के लिए एक
पूर्णकालिक कुलसचिव और संयुक्त माध्यमिक बोर्ड के एक पूर्णकालिक वैतनिक सचिव
* बोंबे लेजिस्लेटिव काउंसिल डिबेट्स, खंड 21, पृ. 286-87, 3 अक्तूबर 1927