64 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
की नियुक्ति करने तथा विश्वविद्यालय के प्रशासनिक कार्य के लिए विश्वविद्यालय और
कॉलेज-प्रोफेसरों से अधिकाधिक लाभान्वित होने का प्रस्ताव किया।
अगर 1914 में सर एल्फ्रेड हॉपकिन्सन जैसे विशेषज्ञ के ये विचार थे, तो मेरी समझ में नहीं आता कि इस अंतराल में ऐसी कौन सी नई परिस्थितियां उत्पन्न हो गई हैं कि हमें इस विश्वविद्यालय पर इस अधिकारी को थोपने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। इसके अलावा रेक्टर के पालन करने के लिए कोई निश्चित कार्यभार नहीं है। विश्वविद्यालय सुधार समिति की रिपोर्ट के पृष्ठ 162 पर मैंने लिखा हुआ पाया है कि उप-कुलपति विश्वविद्यालय का सामान्य पर्यवेक्षण करेंगे और उनके पास ही अधिनियम, कानूनों और अध्यादेशों का पालन करवाने के अधिकार होंगे। महोदय! रेक्टर की स्थिति के बारे में विश्वविद्यालय सुधार समिति ने उसी पृष्ठ पर उल्लेख किया है कि उनकी नियुक्ति पांच वर्ष के लिए होगी और वह पुनः नियुक्ति के योग्य होंगे। वह विश्वविद्यालय के मुख्य कार्यकारी और विद्या अधिकारी होंगे और यह देखने का उनका कर्तव्य होगा कि अधिनियम, कानूनों और अध्यादेशों का सही ढंग से पालन हो रहा है तथा इस उद्देश्य के लिए उनके पास जरूरी सभी अधिकार होने चाहिए। उप-कुलपति के दायित्व और रेक्टर को जो दायित्व सौंपे जाएंगे, उनमें कोई अंतर नहीं दिखाई देता। अगर विश्वविद्यालय सुधार समिति की रिपोर्ट में दी गई स्थिति वही है, जो मैंने अभी सदन के समक्ष प्रस्तुत की है, तो मेरी समझ में नहीं आता कि कैसे यह पद एक ओर उप-कुलपति और दूसरी ओर विश्वविद्यालय के कुलसचिव से भिन्न है, क्योंकि मैंने उसी समिति की रिपोर्ट के पृष्ठ 163 पर लिखा पाया है कि रेक्टर की अनुपस्थिति में कुलसचिव उनके कार्यभार को संभालेंगे। इसलिए मैं नहीं मानता कि रेक्टर का कार्यभार किसी भी अर्थ में उप-कुलपति तथा कुलसचिव के कार्यभार से भिन्न होगा तथा इसलिए मैं नहीं समझता कि एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति जरूरी है। यह अनावश्यक है और वर्तमान परिस्थितियों में विश्वविद्यालय पर एक बोझ है। इसी आधार पर मैं अपने माननीय मित्र श्री जाधव के संशोधन का समर्थन करता हूं।
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बहस पुनः आरंभ
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : मैं इस संशोधन के पक्ष में हूं। वास्तव में, मैं विभिन्न कॉलेजों के प्रधानाचार्यों के विश्वविद्यालय में प्रवेश के पक्ष में नहीं हूं, क्योंकि मैं उन व्यक्तियों में से हूं, जिनका विचार है कि अगर, विश्वविद्यालय को आगे बढ़ना है, तो कॉलेजों को प्राध्यापकों के अधीन होना चाहिए। यह मेरा विचार है और मुझे मालूम नहीं है कि कितने माननीय सदस्य मेरे इस विचार से सहमत हैं। अगर सभी प्रधानाचार्यों को विश्वविद्यालय में प्रवेश करने दिया जाए, तो वे अपने साथ विश्वविद्यालय प्रबंध में
उन्होंने विश्वविद्यालय में शिक्षकों को लाए जाने के लिए कहा था, के समर्थन में दिया गया। * बोंबे लेजिस्लेटिव काउंसिल डिबेट्स, खंड 21, पृ. 326-27, 3 अक्तूबर 1927। यह भाषण श्री हामिल के संशोधन, जिसमें