बंबई विश्वविद्यालय अधिनियम-संशोधन विधेयक
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अलगाववाद की भावना लाएंगे और विश्वविद्यालय को एक संगठित संस्था बनाने के बजाए, इसको एक खंडित संस्था बनाएंगे। पर मेरे माननीय मित्र श्री हामिल ने यह विचार रखा है कि विश्वविद्यालय में उसके कार्य संचालन के लिए पर्याप्त संख्या में शिक्षक जरूर होने चाहिएं। उन्होंने अब भी कहा है कि वर्तमान स्थिति में विश्वविद्यालय में पर्याप्त संख्या में शिक्षक नहीं हैं। महोदय! मेरे विचार में माननीय सदस्य श्री हामिल द्वारा पेश किए गए विचार को ध्यान में रखा जाना चाहिए, क्योंकि मैं समझता हूं कि जबकि हम विश्वविद्यालय को लोकतांत्रिक बना रहे हैं, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि विश्वविद्यालय में पर्याप्त संख्या में शिक्षक होने चाहिए, जो विश्वविद्यालय को इस प्रेसिडेंसी के शैक्षिक मामलों के लिए बनाई गई एक संस्था के रूप में कार्य करने में सहायक सिद्ध हों। मैं यह चाहता हूं कि विश्वविद्यालय में शिक्षकों को रखने की व्यवस्था करते हुए प्रधानाचार्यों के प्रवेश को हम उन कारणों के लिए, जो मैं पहले ही दे चुका हूं, टाल सकते थे। पर मेरा मानना है कि अब यह संभव नहीं है, क्योंकि
खंड 3 की परिभाषा में शिक्षकों में प्राध्यापक शामिल हैं। प्रधानाचार्य प्राध्यापक हैं और वे विश्वविद्यालय में आ सकते हैं, चाहे माननीय सदस्य श्री दस्तूर का संशोधन स्वीकृत हो या न हो। उनका संशोधन केवल व्याख्यात्मक है और इससे कोई नई तब्दीली नहीं होती है। मैं इसलिए इसके पक्ष में हूं।
IV *
डॉ. भीमराव अम्बेडकर : महोदय! मैं इस संशोधन का समर्थन करता हूं। अगर मैं विश्वविद्यालय में सुधारों और विश्वविद्यालय की कार्य पद्धति के बारे में अपने माननीय मित्र श्री मुंशी के विचारों से सहमत होता, तो निस्संदेह मैं इस संशोधन के पक्ष में
खड़ा न होता। पर विश्वविद्यालय के सुधार में दिलचस्पी लेने वाले एक व्यक्ति के तौर पर और दूसरे दलित वर्ग का होने के नाते, मैं सैद्धांतिक तौर पर अपने माननीय मित्र श्री मुंशी के विचारों से असहमत हूं। महोदय! ऐसा लगता है कि मेरे माननीय मित्र श्री मुंशी का विचार है कि विश्वविद्यालय एक ऐसी संस्था है, जिसका उद्देश्य कानून और कानूनी नियम बनाना है तथा सिर्फ परीक्षाएं करवाने और उस विधेयक के अंतर्गत शुरू किए जाने वाले विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम का प्रबंध करना है। महोदय! मेरे विचार में विश्वविद्यालय के बारे में यह दृष्टिकोण बहुत संकीर्ण है। जैसा कि मैं समझता हूं कि विश्वविद्यालय के मूलभूत कार्यों में से एक कार्य जरूरतमंद और गरीबों को उच्चतम शिक्षा की सुविधाएं प्रदान करना है। मैं नहीं मानता कि किसी भी सभ्य देश में कोई भी विश्वविद्यालय अपने अस्तित्व को न्यायोचित ठहरा सकता है, अगर वह केवल परीक्षाओं की समस्याओं को हल करने
* बोंबे लेजिस्लेटिव काउंसिल डिबेट्स, खंड 21, पृ. 414-16, 5 अक्तूबर 1927। यह भाषण मनोनीत सीनेटरों की संख्या 40 से 50 करने के संबंध में श्री नूर मोहम्मद की तरफ से बंबई विश्वविद्यालय विधेयक में पेश किए संशोधन के समर्थन में दिया गया था।