4. बंबई विश्वविद्यालय अधिनियम-संशोधन विधेयक - Page 83

66 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

और डिग्रियां देने का ही कार्य करता रहे। अगर एक आधुनिक विश्वविद्यालय का दायित्व है कि वह पिछड़े समुदायों को उच्चतम शिक्षा की सुविधाएं प्रदान करे, तो मेरे विचार में, इसके परिणामस्वरूप स्वीकार करना चाहिए कि पिछड़े समुदायों का विश्वविद्यालय के मामलों में कुछ नियंत्रण होना चाहिए। महोदय! मैं विश्वविद्यालय को प्राथमिक तौर पर एक तंत्र मानता हूं, जहां उन सभी व्यक्तियों को शैक्षिक सुविधाएं दी जाती हैं, जो इन सुविधाओं का पूरी तरह लाभ उठाने के लिए बौद्धिक तौर पर सक्षम हैं, परंतु जो रुपए-पैसे तथा कुछ और अभावों के कारण इन सुविधाओं को हासिल नहीं कर सकते। महोदय! यह कहा जाता है कि विश्वविद्यालय का संबंध मुख्यतः प्रबुद्ध तथा शिक्षित वर्ग से है और विश्वविद्यालय के सही ढंग से कार्य करने के लिए यह जरूरी है कि कथित शिक्षित वर्ग इसका नियंत्रण करे। मैं यह सिद्धांत मानने के लिए तैयार हूं, अगर शिक्षित वर्ग जो इस विश्वविद्यालय का नियंत्रण करेगा, उसमें सामाजिक सदाचार हो। उदाहरणार्थ, अगर वे निम्न वर्गों की आकांक्षाओं से सहानुभूति रखते हों, निम्न वर्गों के अधिकारों को मान्यता देते हों और मानते हों कि इन अधिकारों का आदर करना चाहिए, तो हम जो कि पिछड़े समुदायों से हैं, शायद अपने भाग्य को कथित उन्नत वर्गों के हाथों में सौंप दें। परंतु महोदय! सदियों से कथित उन्नत और शिक्षित वर्गों के शासन का हमें बहुत ही कड़वा अनुभव है। मेरे विचार में उन्नत वर्गों के लिए यह गौरव की बात नहीं है कि इस देश में जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा, जिसे अपराधी जातियों के नाम से जाना जाता है, मौजूद रहे। निस्संदेह, यह उनके लिए गौरव की बात नहीं है कि देश में एक ऐसी आबादी है, जिसे अस्पृश्य माना जाता है। निश्चय ही वे दलित वर्गों के स्तर को उठा सकते थे, वे अपराधी जातियों के स्तर को उठा सकते थे। अगर वे चाहते तो अपनी संस्कृति हम तक ला सकते थे और हमें अपने बराबर कर सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा न भूतकाल में किया और न ही भविष्य में वे इस दिशा में कुछ करना चाहते हैं। उनकी निर्दयतापूर्ण उपेक्षा ने और हमारी प्रगति के प्रति सक्रिय विरोध के द्वारा, उन्होंने हमें यह पक्का विश्वास दिला दिया है कि वे वास्तव में हमारे शत्रु हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि उनकी इच्छा हमें वहीं रखने की है, जहां हम हैं। मैं पिछले कुछ दिनों से चल रही बहस का जिक्र नहीं करना चाहता, परंतु इस तथ्य में जरा-सा भी संदेह नहीं है कि विरोधी पक्ष के सदस्य, जो सरकार को अपना शत्रु मानते थे, अब इस महत्त्वपूर्ण प्रश्न पर हमें हराने के एक ही उद्देश्य से उसके साथ हैं। उनके इस व्यवहार के पीछे पिछड़े वर्गों के नामांकन द्वारा प्रतिनिधित्व के दावों के सिवाए और कोई कारण नहीं है। यही कारण है कि वे सरकार के साथ मिल गए हैं, जिसका वे हर समय विरोध करते थे। महोदय! क्या हम इस प्रबुद्ध वर्ग का जो अपने दृष्टिकोण में इतना संकीर्ण, इतना अनुदार हो, विश्वास कर सकते हैं?

मेरे माननीय मित्र श्री मुंशी ने कहा है कि यदि यह किसी भौतिक लाभों के लिए