बंबई विश्वविद्यालय अधिनियम-संशोधन विधेयक
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विभाजन का प्रश्न होता, तो वह शायद सीनेट में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के लिए सहमत होते। लेकिन मैं उन्हें यह याद दिलाना चाहता हूं कि दलित वर्ग यह समझ गए हैं कि शिक्षा ही सबसे बड़ा भौतिक लाभ है और उसके लिए वे लड़ सकते हैं। हम भौतिक लाभों को भूल सकते हैं, हम सभ्यता के भौतिकवादी लाभों को भूल सकते हैं, परंतु हम उच्चतम शिक्षा के लाभ को पूर्णरूप से प्राप्त करने के अपने हक और अवसर को नहीं छोड़ सकते। दलित वर्गों के दृष्टिकोण से इस प्रश्न का यही महत्त्व है कि अब उन्हें यह अहसास हो चुका है कि शिक्षा के बिना उनका अस्तित्व सुरक्षित नहीं है। यही कारण है कि सीटों में बढ़ोतरी के लिए संघर्ष किया जा रहा है।
मैं एक और बात का उल्लेख करना चाहता हूं। यह कई बार कहा जा चुका है कि जब विभिन्न कॉलेजों के प्रधानाचार्यों को पृथक प्रतिनिधित्व दिया जा चुका है, तो नामांकित सीटों की संख्या बढ़ाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि अगर प्रधानाचार्यों को विश्वविद्यालय में प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाता, तो सरकार को कम से कम दस सीटें उन्हें देनी पड़तीं। और क्योंकि उनके लिए अब अलग से प्रावधान किया गया है, चालीस की चालीस सीटें दलित वर्गों को मिलेंगी। अब, महोदय! मैं यह कहना चाहता हूं कि यही कारण है कि दलित वर्गों का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए नामांकित सीटों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए। हमें इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि माननीय सदस्य श्री हामिल के संशोधन के परिणामस्वरूप विभिन्न कॉलेजों के जिन प्रधानाचार्यों को प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व मिला है, वे निश्चय ही दलित वर्गों के मित्र होंगे। मुझे इन प्रधानाचार्यों का पर्याप्त अनुभव है और मुझे यकीन है कि सीनेट के लिए चुने जाने वाले व्यक्ति उच्च वर्गों के ही होंगे और वे शिक्षा की मांग करने वाले दलित वर्गों के बचाव के लिए कभी नहीं आएंगे। यदि मंत्री महोदय ने सीनेट में उच्च वर्गों के लिए और दस सीटें दी हैं, तो उन्हें पिछड़े समुदाय के लोगों की सहायता करने के लिए आगे आना चाहिए और संतुलन बराबर करना चाहिए। ऐसा इस विधेयक में पहले से उपलब्ध सीटों में दस और सीटें जोड़कर ही किया जा सकता है। महोदय! हमने अपने डर और अपनी शंकाओं को प्रकट कर दिया है। मेरे विचार में यह उचित ही है कि ऐसे मामले में जहां पिछड़े समुदायों की भावनाएं इतनी प्रबल हैं और जहां वे समझते हैं कि जब तक उन्हें सीनेट में प्रतिनिधित्व नहीं मिलता उनके हितों की सुरक्षा नहीं होगी, सरकार को यह विचार करना चाहिए कि क्या यह सही होगा कि वह दलित जातियों को उच्च जातियों की दया पर छोड़ने के लिए अपनी सरकारी ताकत का प्रयोग करे? मैं सदन के माननीय नेता से यह अपील करूंगा कि इसी में बुद्धिमानी है कि वह इस प्रश्न को इस सदन में मुक्त निर्णय के लिए छोड़ दें। अब सदन को जैसा ठीक लगे, फैसला करे। इस बयान के साथ मैं इस संशोधन का समर्थन करता हूं।