5. बंबई प्राथमिक शिक्षा अधिनियम-संशोधन विधेयक - Page 85

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बंबई प्राथमिक शिक्षा अधिनियम-
संशोधन विधेयक *
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डॉ. भीमराव अम्बेडकर : मुझे इस धारा को समझना बहुत मुश्किल लग रहा है। इस संबंध में उन्होंने जो कुछ कहा है, यदि मैंने वह ठीक से सुना है कि धारा 2 क के अंतर्गत विचाराधीन बोर्ड के लिए हमें एक लोकतांत्रिक गठन के बारे में नहीं सोचना चाहिए, तो मैं उनके इस विचार से सहमत हूं। यह बोर्ड इस इरादे से बनाया जाता है कि यह विशेषज्ञों की एक संस्था हो। जिन सदस्यों को स्कूल बोडऱ्ों द्वारा प्रांतीय बोर्डों के लिए चुने जाने की आशा है, वे केवल जन साधारण के विचारों को ही प्रकट करेंगे। वे इस बोर्ड के कार्य के लिए विशेषता प्राप्त व्यक्ति नहीं ला पाएंगे। साफ जाहिर है कि जिस तरह के व्यक्ति उसमें होंगे, वे ऐसा नहीं कर पाएंगे। अन्य छह सदस्यों की नियुक्ति सरकार द्वारा की जाएगी। इस खंड में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे संकेत मिलता हो कि सरकार केवल शिक्षा के क्षेत्र में विशेषज्ञता प्राप्त व्यक्तियों को नियुक्त करेगी। इस खंड में केवल इतना ही कहा गया है कि तीन व्यक्तियों की नियुक्ति प्रेसिडेंसी की सरकार द्वारा की जाएगी। ऐसा कोई भी संकेत नहीं है कि ये तीनों ही शिक्षा के क्षेत्र में विशेषज्ञता प्राप्त व्यक्ति होंगे। इसलिए प्रांतीय बोर्ड के समूचे गठन के विश्लेषण से लगता है कि इसमें शामिल किए जाने वाले तीन सरकारी अधिकारियों के अलावा, वास्तव में इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि बोर्ड में बहुसंख्या में विशेषज्ञ होंगे। इसलिए मेरे माननीय मित्र को माननीय सदस्य श्री भोले द्वारा सुझाए गए इस सिद्धांत को स्वीकार करना चाहिए कि उसे एक लोकतांत्रिक संस्था के तौर पर देखा जाना चाहिए। उनके दृष्टिकोण से नामांकन के सिद्धांत पर निर्वाचन-सिद्धांत अभिभावी होना चाहिए। यदि मेरे माननीय मित्र कहते हैं कि बोर्ड को एक लोकतांत्रिक संस्था के रूप में नहीं, बल्कि एक सलाह देने वाली संस्था के रूप में देखा जाना चाहिए, तो ऐसा करने के लिए उन्हें यह जरूर कहना चाहिए कि बोर्ड में बहुसंख्यक सदस्य शिक्षा के क्षेत्र में विशेषज्ञ होंगे, लेकिन मुझे संदेह है कि वह ऐसे संशोधन को मानेंगे या नहीं कि प्रेसिडेंसी की सरकार द्वारा नियुक्त किए जाने

* बोंबे लेजिस्लेटिव असेम्बली डिबेट्स, खंड 3, पृ. 2176-77, 21 अप्रैल 1938