इतना सा अधिकार भी स्कूल बोर्ड को नहीं है, तो एक प्रशासनिक अधिकारी यह कैसे समझेगा कि काम की दृष्टि से वह सचमुच स्कूल बोर्ड का कर्मचारी है। मैं माननीय प्रधानमंत्री से यह जानना चाहता हूं कि मान लें, जो अधिकारी उनके अधीन कार्य कर रहे हैं, उन पर उनका कोई नियंत्रण न हो और वह उन्हें किसी अवज्ञा के लिए दंडित न कर सकें, तो उनके अपने विभागों की क्या स्थिति होगी। मेरा निवेदन है कि सुचारू रूप से कार्य संपादन के लिए इतना अधिकार तो स्कूल बोर्डों को दिया जाए कि प्रशासनिक अधिकारी यह समझ सके कि वह इस बात के लिए बाध्य है कि वह स्कूल बोर्ड के उपयुक्त और कानूनी आदेशों का पालन करे। इसके साथ ही मैं अपने संशोधन की सदन में सिफारिश करता हूं।
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बंबई वंशानुगत कार्य अधिनियम में संशोधन
हेतु 1928 का विधेयक संख्या 12
निम्नांकित विधेयक * जिसे बंबई के गवर्नर की विधान परिषद की 19 मार्च 1928 की बैठक में विधान परिषद सदस्य डॉ. भीमराव अम्बेडकर को प्रस्तुत करने की अनुमति दी गई, उसे बंबई विधान परिषद के नियम 20 के अधीन प्रकाशित किया जाता है :
1928 का विधेयक संख्या 12
1874 के बंबई वंशानुगत कार्य अधिनियम में और संशोधन का विधेयक
(1874 का बंबई अधिनियम 3)
जबकि बंबई वंशानुगत कार्य अधिनियम में संशोधन समीचीन है, वह अब इस प्रकार होगाः और जहां भी भारत सरकार अधिनियम की धारा 80ग पर महामहिम गवर्नर की पूर्व अनुमति ली गई है, वह अब इस प्रकार परिपालित होगा :
यह अधिनियम बंबई वंशानुगत कार्य (संशोधन) अधिनियम 1928 कहलाएगा।
1874 के बंबई अधिनियम 3 की धारा 9 में संशोधन - धारा 9 खंड (1) का वाक्यांश ‘चाहे सेवक को मेहनताना निश्चित किया गया हो या नहीं’, इस प्रकार पढ़ा जाए :
किसी सेवक को मेहनताना निश्चित नहीं किया गया है।
- 1874 के बंबई अधिनियम 3 में धारा 9क का समावेश - धारा 9 के पश्चात निम्नांकित जोड़ा जाए :
9क. (1) बंबई वंशानुगत कार्य अधिनियम 1874 (1874 का बंबई अधिनियम 3)
के लागू होने से पूर्व, यदि किसी ब्रिटिश अदालत ने आदेश नहीं दिया हो या
* यह बोंबे गवर्नमेंट गजट, भाग 5, 16 अप्रैल 1928 में प्रकाशित बंबई वंशानुगत कार्य विधेयक 1874 अधिनियम विधेयक का पाठ है। डॉ. अम्बेडकर का भाषण पृ. 88-103 पर है।