78 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
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डॉ. भीमराव अम्बेडकर : महोदय! मैं 1928 के विधेयक संख्या 12 को प्रस्तुत कर रहा हूं, जिसे प्रथम बार पहली ‘बंबई वंशानुगत कार्य अधिनियम 1874 में अगले संशोधन हेतु’ पढ़ा जाए। यह विधेयक पटेल या कुलकर्णी से संबंधित नहीं है। इस विधेयक में वर्णित वंशानुगत कर्मी वंशानुगत कार्य अधिनियम के अंतर्गत कर्म करने वालों को कहा गया है। फिलहाल इन क्षुद्र कर्म करने वालों का अर्थ है, दक्खन के महार, गुजरात के बेठिया अथवा वर्थनिया, कर्नाटक के रामोशिस या जुगलिया तथा होलिया वर्ग से है। इन क्षुद्र धारकों में अधिकांश महार हैं और इस सदन में मेरी प्रस्तावित टिप्पणियां मोटे तौर पर क्षुद्र कर्मी प्रतिनिधि-स्वरूप महारों के बारे में होंगी।
महोदय! इस विधेयक के प्रावधानों को समझने के उद्देश्य से मेरे विचार में यह आवश्यक है कि सदन को उन ज्यादतियों और शिकायतों से अवगत कराया जाए, जिनके कारण मुझे यह विधेयक लाना पड़ा है। ये ज्यादतियां बहुत अधिक हैं, इसलिए मैं वास्तव में इनकी विशद् व्याख्या कर सदन का समय नहीं लेना चाहता हूं। मैं इस प्रथा पर, इस उत्पीड़न पर मोटे तौर से प्रकाश डालना चाहता हूं। महोदय! पहली बात तो यह है कि इस बात को ध्यान में रखा जाए कि ये क्षुद्र वतन धारक वतन कानून के अनुसार सरकारी सेवक हैं। परंतु कहीं भी इनके दायित्वों का उल्लेख नहीं है। इसके बारे में कुछ पता नहीं है। दरअसल, इस बारे में सचमुच कोई कुछ नहीं कह सकता कि ये महार वतनदार किस विभाग से संबद्ध हैं। सच्चाई यह है कि प्रत्येक विभाग इनकी सेवाओं का दावा करता है। इन्हें सिंचाई विभाग में काम के लिए बुलाया जा सकता है, शिक्षा विभाग में बुलाया जा सकता है, इन्हें टीकाकरण विभाग में तलब किया जा सकता है, शिक्षा विभाग में बुलाया जा सकता है, इन्हें स्वायत्तशासी विभाग भी बुला सकता है और मेरा ख्याल है कि इन्हें पुलिस विभाग भी बुला लेता है। यहां तक कि आबकारी विभाग की सेवादारी भी इनका काम है। मेरा निवेदन है कि यह एक विचित्र प्रथा है। प्रत्येक सरकारी कर्मचारी जानता है कि वह किस विभाग से संबद्ध है और उसका क्या कार्य है। मैं समझता हूं कि किसी भी विभाग में कोई ऐसा कर्मचारी नहीं है, जिसे किसी भी विभाग में भृत्य के रूप में बुलाया जा सके, किंतु हर दृष्टि से महार ऐसे व्यक्ति हैं और प्रत्येक विभाग के हर कार्य के लिए भृत्य समझे जाते हैं। फिर, उसे कभी भी बुलाया जा सकता है, चाहे रात हो या दिन। कोई अन्य कर्मचारी कितने भी छोटे पद पर क्यों न हो, निश्चित घंटों में ही कार्य करता है! जिलाधीश के दफ्तर या कोई अन्य कार्यालय का हर चपरासी जानता है कि उसे एक निश्चित समय के लिए दफ्तर जाना है और निश्चित समय पर वापस घर आ जाना है। परंतु महारों के साथ ऐसा नहीं है। उन्हें न केवल दिन में काम पर बुलाया जा सकता है,
* बोंबे लेजिस्लेटिव काउंसिल डिबेट्स, खंड 23, पृ. 708-21, 3 अगस्त 1928