6. बंबई वंशानुगत कार्य अधिनियम - Page 96

बंबई वंशानुगत कार्य अधिनियम-संशोधन विधेयक

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अपितु रात को भी उन्हें काम पर बुलाया जा सकता है। यदि कोई अधिकारी किसी महार को रात में सेवाकार्य के लिए बुलाता है, तो चाहे आंधी, पानी हो या बिजली चमक रही हो या कोई अन्य कठिनाई हो, वह इंकार करने का दुस्साहस नहीं कर सकता।

तीसरी शिकायत यह है। महारों की जहां तक बात है, एक व्यक्ति का नाम सेवा पंजिका में दर्ज है और वह अकेला व्यक्ति नहीं है, जिसे सेवा करनी है, बल्कि उसका सारा परिवार सरकार के सेवाकार्य के लिए बाध्य है। यदि सेवा पंजिका में जिस व्यक्ति का नाम दर्ज है और जो काम करने के लिए बाध्य है, वह सेवाकार्य के लिए बाहर गया हुआ है, या सरकारी काम से अनुपस्थित रहने पर घर से कोई जवाब नहीं मिल रहा है, तो उसके पिता को सेवा के लिए बुलाया जा सकता है। उसके पिता के अनुपस्थित रहने पर, उसके दादा को सेवा के लिए बुलाया जा सकता है। परंतु उसके पिता या दादा का नाम रजिस्टर में दर्ज नहीं हो सकता। मेरा निवेदन है कि केवल पुरुष ही नहीं, बल्कि महिलाएं भी सरकारी सेवा में बुलाई जा सकती हैं। यदि सेवक अनुपस्थित है, तो उसकी पत्नी को सेवाकार्य के लिए बुलाया जा सकता है। यदि पत्नी भी अनुपस्थित है, तो उसकी मां को बुलाया जा सकता है। यदि उसकी मां अनुपस्थित है, तो उसके परिवार में छोटी उम्र की स्त्रियों को भी बुलाया जा सकता है। जरा कल्पना कीजिए कि एक 18 वर्षीय महार स्त्री को, किसी 18 वर्षीय पुलिस कर्मचारी द्वारा पांच-छह मील तक अपना सामान ले जाने के लिए बुलाया जाता है, तो इस स्थिति में उसके सामने जो खतरा है, वह कैसा है? महोदय! इस समय जो प्रथा मौजूद है, उसके अनुसार इस खतरे से कोई बचाव नहीं है। जो प्रथा इस समय मौजूद है, उसके अनुसार न केवल सेवक को सेवा करनी होती है, बल्कि उसका पूरा परिवार सेवाकार्य के लिए बाध्य है। मेरा निवेदन है कि यह एक क्रूर प्रथा है और किसी सरकारी विभाग में नहीं है।

अब मैं मेहनताने के प्रश्न पर आता हूं। वह मेहनताना भी क्या है, जो इन बेचारों को दिन-रात कड़ी मेहनत करके मिलता है। यदि मैं सदन को बताऊं तो उसे यकीन नहीं होगा कि जिस सेवा की उनसे अपेक्षा की जाती है, उसपर सरकारी खजाने से उनको सीधे कुछ नहीं मिलता। थाणे जिले में महार सेवक को डेढ़ रुपया महीना मिलता है। अहमदनगर में भी इतना ही मिलता है। पूर्वी खानदेश में उन्हें पौने दो रुपए दिए जाते हैं, जबकि पश्चिमी खानदेश में नौ आने और चार पाइयां मिलती हैं। नासिक जिले में 13 आने और चार पाइयां मिलती हैं। पूना में एक रुपया, एक आना और चार पाइयां मिलती हैं। सतारा में यह राशि दो आना और एक पाई है तथा शोलापुर में 3 आना और 3 पाइयां प्रतिमास दी जाती हैं। बंबई के उपनगरीय जिले में यह रकम साढ़े नौ रुपए से 5 आना प्रतिमास है। बेलगांव में सरकारी कोष से कोई वेतन नहीं दिया जाता है। मार्च 1925 के अधिवेशन में किए गए प्रश्न के उत्तर में सरकार से रत्नागिरी और कोलाबा जिलों के बारे में कोई सूचना प्राप्त नहीं हुई। यह सदन जान सकता है कि कितनी तुच्छ और अल्प राशि सरकार उस सेवा