6. बंबई वंशानुगत कार्य अधिनियम - Page 97

80 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

के लिए देती है, जिसकी उनसे अपेक्षा की जाती है। महार वतनदरों की आय के दो साधन हैं। पहला साधन है, इनाम भूमि और दूसरा है, महार वतनदारों को ग्रामीणों द्वारा दिए जाने वाले बलूते। यह इनाम भूमि उन्हें अंग्रेज सरकार से नहीं मिली है, बल्कि प्राचीन सम्राटों की बख्शीश है। महार वतन इस देश के प्राचीन वतन हैं और यह तमाम भूमि उन्हें प्राचीन काल से प्राप्त है। मुझे पता नहीं है कि जो जमीन इन्हें प्राचीन काल में मिली थी, क्या अंग्रेज सरकार ने उसमें कोई बढ़ोतरी की है। कीमतें बढ़ गई हैं, रहन-सहन का दर्जा ऊपर उठ गया है। मुझे पता नहीं है कि अंग्रेज सरकार की स्थापना के बाद कितनी बार प्रत्येक सरकारी कर्मचारी को वेतन वृद्धि मिली है। किंतु अंग्रेज सरकार ने वतनदारों के पारिश्रमिक की ओर निगाह तक नहीं डाली है। उन्होंने इन बेचारों को उसी हालत में छोड़ रखा है, जो प्राचीन सम्राटों की कृपा से इन्हें बख्शा गया है। महारों की संख्या कई गुना बढ़ गई है और इन्हें दी गई जमीन टुकड़ों में बंट-बंटकर इस स्थिति में पहुंच गई है कि उसका अब कुछ मूल्य ही नहीं रहा है। इनकी आय का स्रोत दूसरे साधन से है जिसे बलूते कहा जाता है। महोदय! भुगतान के इस साधन की विशेषता भी इस सदन के ध्यान में लाने योग्य है। मैं दोहराता हूं कि महार सरकारी कर्मचारी हैं, लेकिन सरकार उन लोगों को मेहनताना देने की कोई जिम्मेदारी महसूस नहीं करती। अन्य सभी मामलों में सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह अपने चपरासियों, क्लर्कों, अधिकारियों और नियोक्ताओं को वेतन दे। किंतु महारों के मामले में जहां तक बलूते का संबंध है, उसके लिए कोई ऐसा तरीका नहीं है कि सरकार इसका दायित्व माने कि उनका पारिश्रमिक मिलना चाहिए। इसका कारण यह है कि वेतन कानून के अधीन बलूते के भुगतान के बारे में महार किसानों की कृपा पर निर्भर है। यदि किसान उसे बलूते को देना चाहें, तो वह मिल सकता है। यदि साल भर काम कराने के बाद किसान उसे अंगूठा दिखा देता है, तो महार यह समझ लेगा कि उसकी मेहनत पानी में गई।

महोदय! मैं निवेदन करता हूं कि यह एक क्रूर और अन्यायपूर्ण प्रणाली है। यदि सरकार चाहती है कि ये लोग उसके लिए कार्य करें, तो यह नितांत आवश्यक है कि वह महारों को भुगतान की जिम्मेदारी ले। वह इस जिम्मेदारी से लापरवाह नहीं रह सकती और तीसरे पक्ष पर यह काम नहीं छोड़ सकती, जैसे रैयत कहा जाता है। परंतु मौजूदा प्रणाली में यही सब कुछ हो रहा है। महोदय! क्या इसका भरोसा है कि वतन जारी रहेगा? क्या इस बात का भरोसा है कि वतन से बेदरवली हो सकती है या बहाली हो जाएगी? महोदय! इस बारे में कोई भरोसा नहीं है। इसका कारण स्पष्ट और सहज है। हर मामले में सेवा की अवधि उस अधिकारी की मर्जी पर निर्भर है, जिसके अधीन वह कार्य करता है। इस क्षेत्र में पाटिल, कुलकर्णी और मामलतदार वे अधिकारी हैं, जिनके अधीन महार को कार्य करना पड़ता है। महार अपने वतन को उस समय तक सुरक्षित नहीं समझ सकता, जब तक कि सरकार की सेवा के उपरांत, मेरा मतलब है वैध सेवा, जो एक सरकारी नौकर से अपेक्षित है, वह स्वेच्छा से अपने मौजूदा अधिकारियों, यानि