6. बंबई वंशानुगत कार्य अधिनियम - Page 98

बंबई वंशानुगत कार्य अधिनियम-संशोधन विधेयक

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पटेल, कुलकर्णी और मामलतदार की बेगार नहीं करता। जब तक वह उनका कृपापात्र नहीं बनता, उसको कोई भरोसा नहीं हो सकता और वह कृपा प्राप्त करना इतना आसान नहीं है। यह कृपादृष्टि तभी होती है, जब वह बेगार करे। इसके बावजूद कुछ नहीं कहा जा सकता कि पाटिल, कुलकर्णी ऐसी रिपोर्ट नहीं देगा कि महार ने अपने कर्तव्य का पालन नहीं किया है। यह रिपोर्ट बिल्कुल झूठी और बनावटी हो सकती है। ऐसे अनेक मामले हैं, जब पाटिल और कुलकर्णी ने ऐसी रिपोर्ट दी है और मामलतदार ने उन पर कार्रवाई की है तथा महारों का वतन वापस ले लिया गया है या बहाल हो गया है। पिछले कुछ वर्षों का मेरा अनुभव है कि जब मेरे सामने अनेक ऐसे मामले आए जहां महार वतन वापस लिए गए या बहाल हुए। मैंने अपनी तरफ से भरसक प्रयत्न किया और वरिष्ठ अधिकारियों से कहा, डिप्टी कलक्टर, सहायक कलक्टर और कलक्टरों से संपर्क किया कि मामलतदारों के फैसलों को बदला जाए, परंतु मुझे एक भी मामले में सफलता नहीं मिली। सारांश यह है कि मातहत अधिकारियों को यह विश्वास होता है कि उनके फैसले अटल हैं, चाहे वे सही हों या गलत हों। कानूनी आधार हो या नहीं। वह फर्जी गवाही पर किए गए हों या नहीं, वरिष्ठ अधिकारी उन्हें स्वीकार कर लेंगे। भरोसे की ऐसी भावना के आधार पर इन बदनसीब लोगों के उत्पीड़न और कष्टों की कोई सीमा नहीं है। मेरा निवेदन है कि इस प्रणाली का यह एक अन्य दोष है।

महोदय! यदि इस प्रथा से केवल कार्मिक महार ही प्रभावित होते और अन्य दलित वर्ग इससे मुक्त होते, तो शायद मैं इस मुद्दे को इस शिद्दत से न उठाता। मुसीबत यह है कि इस प्रणाली के दुष्परिणाम इतने व्यापक और सर्वग्राही हैं कि वे पूरे दलित वर्ग को अपनी चपेट में ले लेते हैं। महोदय! सदन इस बात पर शायद विश्वास नहीं करेगा, यदि मैं कहूं कि वेतन प्रथा के कारण गांवों का महार समुदाय परांजपे परिपत्र के लाभों पर दावा नहीं कर सकता कि उनके बच्चे स्कूलों में अन्य बच्चों के साथ बैठें। यद्यपि परिषद ने यह प्रस्ताव पारित कर दिया है कि दलित वर्गों के लोगों को धर्मशालाओं तथा अन्य सार्वजनिक स्थानों के इस्तेमाल की अनुमति होनी चाहिए, फिर भी दलित वर्गों के लोग परिषद द्वारा प्राप्त इन विशेषाधिकारों के बारे में मांग नहीं कर सकते। जैसा कि मैं जानता हूं, यह परिषद इस पर विश्वास नहीं करेगी कि वतन-प्रणाली इस प्रकार की स्थिति के लिए जिम्मेदार है। परंतु महोदय! मैं केवल यही स्पष्टीकरण दे सकता हूं कि महार समुदाय प्रगति क्यों नहीं कर सका है? इसका कारण बहुत साधारण है। उदाहरण के लिए, जब कभी किसी विशेष गांव में कोई महार समुदाय किसी विशेष दिशा में उन्नति की कामना करता है और किसान उसे पसंद नहीं करते हैं, तो तत्काल ही किसान बलूते को देना बंद कर देते हैं और सामाजिक बहिष्कार की घोषणा कर दी जाती है। मुझे एक मामले की जानकारी है, जब गांव वालों ने बलूते को देना बंद कर दिया और सामाजिक बहिष्कार की घोषणा कर दी, क्योंकि किसी महार का संबंधी गांव में जूते-मोजे पहनकर गया और गांव वालों ने उसके इस काम को पसंद नहीं किया। मैं एक घटना के विषय में जानता हूं, जब कि गांव वालों ने बलूते को देना रोक दिया