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सुनिश्चित करना है कि कार्यपालिका अपने कार्यपालक प्राधिकार और संसद द्वारा बनाए गए कानून से परे हटकर कार्य नहीं करेगी तथा कार्यपालिका किसी कानून जो संविधान द्वारा सृजित न्यायपालिका के अंग द्वारा की गई व्याख्या के प्रतिरोध में ही उस कानून का अपने ढंग से व्याख्या नहीं करेगी।
श्री एच.वी. कामथः यदि किसी मामले विशेष में राष्ट्रपति अपनी मंत्री परिषद की सलाह के अनुरूप कार्यवाही नहीं करे तो क्या उसे संविधान का उल्लंघन माना जाएगा और उस पर महाभियोग चलाया जाएगा?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः इसके बारे में थोड़ी सी भी शंका नहीं है।
माननीय श्री के. संथानम (मद्रास - जनरल)ः मैं डा. अम्बेडकर के वक्तव्य के बारे में कुछ और जोड़ते हुए यह बताना चाहता हूँ कि कतिपय ऐसे सीमांत मामले हैं, जिन पर राष्ट्रपति, मंत्रियों की सलाह स्वीकार नहीं कर सकता है। जब मंत्रालय सभा भंग कराना चाहता हो, राष्ट्रपति के पास ऐसा कहने का खुला विकल्प हो सकता है कि वह दूसरी सरकार, जिसे बहुमत का विश्वास हासिल है, की स्थापना कराएगा और प्रशासन जारी रहेगा। कुछ सीमान्त मामले हैं, जहाँ जिम्मेदार सरकार के हित में अपने मंत्रियों की सलाह को नहीं मानेगा।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः इसके उत्तर में, मैं केवल एक ही बात कहना चाहूँगा। ऐसी स्थिति एक बार आ चुकी है। मैकाले की पुस्तक हिस्ट्री ऑफ इंग्लैंड में यह बड़े ही स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जा चुका है कि किंग क्या कर सकता है। लेकिन मैं यह बताना चाहता हूँ कि ये परंपरागत मामले हैं। कनाडा में यह प्रश्न उठा था जब मैकेंजी, किंग ने सभा भंग करनी चाही थी। प्रश्न यह था कि क्या गवर्नर जनरल निर्णय देने के लिए बाध्य थे या फिर वह वैकल्पिक सरकार का गठन करने के लिए विपक्ष के नेता को बुलाने के लिए स्वतंत्र थे। ब्रिटिश सरकार की सलाह पर, गवर्नर जनरल ने मैकेंजी की सलाह मान ली और संसद को भंग कर दिया।
श्री एच.वी कामथः डॉ. अम्बेडकर के ओबिटर डिकटम की बजाय एक संवैधानिक उपबंध क्यों नहीं होना चाहिए।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः हम इस प्रश्न पर इस तरीके से विचार नहीं कर सकते।
{ श्री टी.टी. कृष्णमाचारी द्वारा पूर्व में उल्लिखित संशोधन संख्या 360 स्वीकृत हुआ। अनुच्छेद 62 का खंड (5क) का लोप कर दिया गया। }
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